चेहरा : Physiological Horror Story


हादसा

बारिश भोपाल शहर पर लगातार बरस रही थी, मानो आकाश अपने ज़ख़्मों का लहू बहा रहा हो। कड़कड़ाती गड़गड़ाहट से खिड़कियाँ काँप रही थीं, और बूँदें टीन की छतों पर ढोलक की भयावह लय बजा रही थीं—जैसे किसी रूह का मातम। उस शोर के बीच लावण्या का दिल बेसुध घबराहट से धड़क रहा था। कुछ हफ़्ते पहले तक वह एक सिंपल सी लड़की थी—हमीदिया रोड पर एक छोटे से कैफ़े में वेट्रेस, घर में अपनी बूढ़ी माँ की सहारा और दोस्तों के लिए हँसी का कारण। लेकिन अब… उसके आसपास की दुनिया जैसे बदल चुकी थी।

बरसते पानी के बीच कभी-कभी अजीब सी सरसराहट सुनाई देती, मानो कोई गीले कदमों से छत पर घूम रहा हो। खिड़की पर ठंडी बूँदें नहीं, बल्कि उंगलियों जैसी परछाइयाँ फिसलती दिखतीं। अंधेरे में हर चमकती बिजली उसके कमरे की दीवारों पर ऐसे चेहरे उकेर देती, जिन्हें उसने कभी देखा नहीं था। और उसी पल उसे अहसास हुआ—वह इस तूफ़ान में अकेली नहीं है।

लेकिन एक भयानक सड़क दुर्घटना ने उसकी ज़िंदगी की तस्वीर पलट दी। रात के अँधेरे में तेज़ रफ्तार ट्रक से टकराने के बाद सड़क पर उसका शरीर ऐसे गिरा, जैसे किसी गुड़िया को बेरहमी से फेंक दिया गया हो। खोपड़ी गहरे दरारों से चटक चुकी थी, और चेहरा इतनी बुरी तरह से फट गया कि माँ भी पहचान न सके। टूटे दाँतों और खून से सने मांस के बीच उसकी आँखें अजीब ढंग से अधखुली थीं—मानो मरने के बाद भी किसी अनदेखी चीज़ को घूर रही हों।

अब वह भोपाल के हमीदिया अस्पताल के ऑपरेटिंग टेबल पर निर्जीव-सी लेटी थी। चारों ओर धातु के औज़ारों की ठंडी चमक थी, और हवा में फिनाइल और खून की मिली-जुली गंध तैर रही थी। डॉक्टर उसकी साँसों को वापस लाने की कोशिश में जुटे थे। उसकी आख़िरी उम्मीद एक कठिन सर्जरी थी—शायद यह उसे जीवन का दूसरा मौका दे सके। लेकिन ऑपरेशन थिएटर की बत्तियाँ जब-जब टिमटिमातीं, उनके बीच उसकी छाया अजीब आकारों में फैल जाती—मानो कोई और भी उस टेबल पर उसके साथ मौजूद हो।

अजनबी चेहरा

डॉ. हरीश शुक्ला, मध्यप्रदेश के सबसे प्रतिष्ठित और अनुभवी प्लास्टिक सर्जन, ने धीरे से उसका हाथ थामते हुए कहा—“लावण्या, तुम चिंता मत करो। ऑपरेशन सफल होगा। यह तुम्हें सिर्फ नया चेहरा नहीं देगा, बल्कि एक नई ज़िंदगी भी। तुम्हें फिर से जीने का मौका मिलेगा।”

जैसे ही एनेस्थीसिया की बूँदें उसके नसों में घुलीं, उसके शरीर ने अनजाने भय की हल्की कंपकंपाहट महसूस की। आँखें धीरे-धीरे बंद होने लगीं, और अंतिम क्षणों में उसके मन में अचानक पुराने दृश्य तैरने लगे—बारिश में माँ के साथ खिड़की के पास चाय की प्यालियाँ पकड़ते हुए हँसते हुए, गली में बच्चों की खेलती आवाज़ें, अपने दोस्तों के साथ बिताए साधारण पल और साधारण ज़िंदगी की छोटी खुशियाँ जीते हुए देखा

लेकिन इस नाज़ुक यादों के बीच, उसके चारों ओर अजीब सी परछाइयाँ घूमने लगीं। खिड़कियों पर टिमटिमाती बत्तियाँ अचानक अजीब चेहरे दिखाने लगीं, और उसकी यादों में कुछ नकली हँसी की गूँज घुल गई—जैसे कोई उसका अतीत छुपकर देखने आया हो। लावण्या ने महसूस किया कि ये केवल यादें नहीं, बल्कि किसी अनदेखी शक्ति का संकेत थीं, जो उसके भविष्य को बदलने के लिए वहाँ मौजूद थी।

लेकिन जब लावण्या ने खुद को होश में पाया, तो उसके चारों ओर धुंध और चमकती सफ़ेद रोशनी में सब कुछ घुला हुआ सा था। दवाओं की जकड़न ने उसकी इंद्रियों को सुन्न कर दिया था, और हर आवाज़, हर हलचल गूंजती रह गई थी—मानो दुनिया अपने धीमे, डरावने लय में हिल रही हो। उसके चेहरे पर जकड़ी गई भारी पट्टियाँ ठोस बोझ की तरह महसूस हो रही थीं, और दिल की तेज़ धड़कन के साथ हर पल उसका डर बढ़ता जा रहा था।

जैसे ही उसने धीरे-धीरे हाथ उठाकर पट्टियों को छूने की कोशिश की, सफेद साड़ी में नर्स कमला ने उसकी हथेली को मजबूती से थाम लिया।

"अभी नहीं, बेटी… शांत रहो। अभी तुम्हें पूरी तरह ठीक होने की ज़रूरत है। अभी घाव नहीं भरे है।"

लेकिन कमला की आवाज़ के पीछे एक हल्की काँप और अजीब सा साया उसके मन में डर की लकीर खींच गया—मानो कोई अनदेखा मेहमान उस कमरे में मौजूद हो।

कई दिनों तक केवल मशीनों की ठंडी, रिदमिक बीप ही उसका साथी रही, जो हर पल उसके धड़कते दिल की गूँज के साथ मेल खा रही थी। कमरे का सन्नाटा, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की मद्धम चमक और बाहरी बारिश की लगातार टपकती बूँदें—सब मिलकर एक अजीब, डरावना माहौल बना रही थीं।

फिर वह पल आया, जब डॉ. शुक्ला ने सावधानी से पट्टियाँ हटाईं। लावण्या की आँखें आईने की ओर टिकीं, और सामने जो चेहरा उभरा, उसने उसकी रूह को झकझोर दिया। चेहरा निस्संदेह बेहद सुंदर था—निर्मल, संतुलित, जैसे किसी मूर्ति की तरह… लेकिन अजनबी।

हर आँख , हर नाज़ुक नक्श, हर मुस्कान का झरना उसके भीतर अजीब भय और असहजता की लहर छोड़ गया। आईने में अपना चेहरा देख कर उसे ऐसा लग रहा था, की मानो कोई और, उसकी पहचान की गहरी खाई में उतरकर, उसकी जगह ले चुका हो।

लावण्या की पूरे शरीर में ठंडी धड़कन दौड़ गई—यह चेहरा उसका नहीं था। आईने में जो चेहरा उभरा, वह किसी और की पहचान का था। उसकी आँखों के सामने अचानक रिया शर्मा की शक्ल चमकी जो एक न्यूज़ रिपोर्टर थी— वह लड़की जो पिछले एक साल से भोपाल के कोहेफिज़ा इलाके से रहस्यमय ढंग से गायब हो गई थी।

उसकी त्वचा की नर्मी, गहरी आँखें, और मुस्कान की छोटी परछाईं—सब कुछ बिल्कुल वैसा ही था जैसे अख़बारों और सोशल मीडिया में हर दिन छपी उसकी गुमशुदगी की तस्वीरों में दिखाया गया था। लावण्या के मन में एक अनजानी और डरावनी हिचक उठी—मानो रिया की आत्मा अभी भी कहीं उसके आसपास मंडरा रही हो।

कमरे की ठंडी रोशनी ने आईने में और अधिक भयंकर छायाएँ पैदा कर दीं। खिड़कियों से टपकती बारिश की बूँदें जैसे किसी अजीब ताल पर ढोलक की तरह टकरा रही थीं, और हर टपकन के साथ लावण्या की धड़कन तेज़ होती गई। उसकी रूह ने महसूस किया कि यह सिर्फ आईने का खेल नहीं था—कोई या कुछ उसकी पहचान को अपने अंधेरे हाथों में लेने की कोशिश कर रहा था।

जब लावण्या घर लौटी, तो भोपाल की परिचित गलियाँ अचानक अनजानी और डरावनी लगने लगीं। पुराने पेड़ों की लंबी, घुमावदार शाखाएँ जैसे काली छायाओं की तरह उसके चारों ओर फैल गई थीं, और हर सरसराहट में अजीब फुसफुसाहटें सुनाई दे रही थीं—जैसे कोई छिपकर उसके कदमों का पीछा कर रहा हो। हवा ठंडी और गंधी हुई थी, और हर झोंका उसके कानों में मनहूस़ आवाज़ें गूँजता छोड़ता।

गली मोहल्ले वाले जब उससे मिलने आये तो हैरानी तो हुए साथ ही डर भी गए, अजनबी लोग भी उसे घूरते हुए पूछ रहे हों कि क्या वह सच में वही लड़की है। किसी को भी इस बात पर यकीन नहीं हो रहा था की ये वही लावण्या है। 

उसकी सहेली मीना ने उसे देखते ही चौंककर कहा—

“लावण्या… तुम… अरे, तू तो हू-ब-हू रिया जैसी लग रही है! जैसे वो वापस आ गई हो…तुम बिल्कुल रिया शर्मा जैसी दिख रही हो! कहीं तुम… रिया की भूत तो नहीं”

लावण्या ने हँसने की कोशिश की, लेकिन भीतर से एक अजीब सिहरन ने उसे जकड़ लिया। हर आंखों की झलक में, हर मुस्कान की परछाई में उसे रिया की आत्मा की गूँज महसूस होने लगी—मानो कोई उसके अंदर से उसे पहचानने की कोशिश कर रहा हो। 

कुछ महीनो तक आराम और दवाईयाँ का सिलसिला चलता रहा और जल्द ही नवंबर महीने के पहले हफ्ते में लावण्या ने काम पर जाना शुरू कर दिया। पर उससे हमसे ऐसा लगता की कोई है जो उस पर निगाहें टिकाये बैठा है। कभी ग्राहकों के बीच तो कभी बाहर चलती भीड़ में।

मुलाक़ात

एक ठंडी और बरसाती रात, काम से लौटते समय, लावण्या पुराने शहर की संकरी और धूल भरी गलियों से गुजर रही थी। अचानक, बारिश में भीगी सड़क पर एक लंबा, काले कोट वाला आदमी उसके सामने आया गया। चेहरा गहरे हुड के नीचे छिपा हुआ था, और उसकी मौजूदगी जैसे अंधेरे का हिस्सा हो।

उसकी आवाज़ धीमी, खुरदुरी और गहरी थी, मानो किसी कर्कश पिशाच की होंठों से निकल रही हो—

“रिया… तुम्हें मेरे साथ चलना होगा। जो हुआ, उसे याद करना होगा।”

लावण्या के पैरों की जड़ें जम गईं। उसका दिल रुकने सा लग रहा था। “तुम… कौन हो?” उसने हकला कर पूछा।

आदमी ने फुसफुसाते हुए कहा—“वे तुम्हें ढूँढ रहे हैं। खतरा बहुत बड़ा है… और तुम्हारे पीछे वे अभी भी हैं।”

लावण्या का घबराया हुआ दिल तेज़ी से धड़कने लगा। उसकी आँखें चारों ओर घुमी, पर कोई और नहीं था—सिवाय उस अजनबी की, जो अब उसकी परछाई बनकर उसके पीछे खड़ा था। उसने जैसे-तैसे भागना शुरू किया, और पीछे से उस आदमी की आवाज़ गूँज उठी—

“तुम अपने अतीत से नहीं भाग सकती… तुम हमेशा उसके लिए चुनी गई हो।”

हर शब्द जैसे ठंडी हवा की तरह उसकी रीढ़ में घुस रहा था, और लावण्या ने महसूस किया कि यह डर सिर्फ बाहरी नहीं—वह उसके भीतर से उसकी आत्मा को भी खा रहा था।

उस रात नींद ने लावण्या को छोड़ दिया, जैसे उसके सिरहाने कोई अदृश्य प्रेत बैठा हो। हर खटखट, हर दीवार पर खिंची हुई परछाई उसे जकड़ रही थी, और हर छोटी आवाज़ उसके दिल की धड़कन को तेज़ कर रही थी। कमरे की खिड़कियों पर बारिश की बूँदें कभी-कभी अजीब चेहरे उकेरतीं, और बिजली की चमक में उसके चारों ओर के साए जैसे जीवित हो उठते।

बेचैन मन को शांत करने के लिए उसने इंटरनेट खोल लिया और रिया शर्मा के बारे में न्यूज़ और सोशल मीडिया खंगाला—

"लापता लड़की के परिवार को अब भी है उम्मीद।"

फोटो देखते ही उसके पूरे शरीर में ठंडक दौड़ गई। वही चेहरा… वही गहरी आँखें… वही मुस्कान, जो अब उसकी अपनी त्वचा पर प्रतिबिंबित हो रही थी। जैसे कोई रहयमयी शक्ति उसके मन और आईने दोनों में उसी के अतीत को जिंदा कर रही हो। कमरे में घुटन बढ़ गई, और लावण्या को महसूस हुआ कि यह सिर्फ तस्वीर नहीं थी—कहीं कोई उस पर नजर गड़ाए बैठा था, उसकी पहचान को छीनने के लिए।

जिज्ञासा और भय के घने मिश्रण के बीच, लावण्या ने तय किया कि वह रिया के परिवार से मिलकर सच का पता लगाएगी। रात की नम हवा में वह कोहेफिज़ा के पुराने, सुनसान मोहल्ले में बने एक पुराने मकान के सामने पहुँची। लावण्या ने डोर बेल बजाई

दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला और अंदर से एक अधेड़ महिला दिखाई दी—उसकी आँखों में उम्मीद और डर का विचित्र मिश्रण था।

“रिया… मेरी बेटी!” महिला की आवाज़ फूट-फूटकर कमरे में गूँजी, और वह अचानक फर्श पर गिरकर बेकाबू होकर रोने लगी।

लावण्या के हाथ काँप रहे थे, दिल तेज़ी से धड़क रहा था। “नहीं आंटी… मैं… मैं लावण्या हूँ। मेरा एक्सीडेंट हुआ था। मैं बस रिया के बारे में जानना चाहती थी।”

लेकिन महिला ने उसके हाथों को मजबूती से थाम लिया और चीख़ पड़ी—“तू ही रिया है! मैंने अपनी बेटी को पहचान लिया है!”

उस चीख़ के साथ कमरे की हवा अचानक सघन और ठंडी हो गई। दीवारों पर लटकती परछाइयाँ जैसे जीवित हो उठीं और फुसफुसाहटें कानों में घुसने लगीं। लावण्या का मन डर और उलझन के जाल में फँस गया। उस पल से उसे एहसास हुआ कि यह केवल पहचान का मामला नहीं था—कहीं कोई अदृश्य शक्ति उसके चारों ओर मंडरा रही थी, जो उसे और रिया के अतीत की गहरी और भयानक सच्चाई में खींच रही थी।

लावण्या ने रिया की माँ से उसके दोस्तों और साथ काम करने वालों की बारें में पूछा और उनसे मिलने के लिए निकल पड़ी।

आखिरी सच

रिया के पुराने दोस्तों से मिलकर लावण्या ने कई नए नाम और रहस्य उजागर किए—सबसे खतरनाक नाम था आदित्य मल्होत्रा, रिया का प्रेमी, जो उसकी गुमशुदगी के बाद से ही कहीं लापता था। कहते हैं, रिया ने किसी खतरनाक रैकेट का पर्दाफाश करने की कोशिश की थी, और यही उसे अंधेरे में खींच गया।

एक शाम, लावण्या आदित्य से मिलने के लिए तालाब रोड के एक सुनसान और अंधेरे बार में पहुँची। बार की घनी छायाओं और धुंधली रोशनी में आदित्य को देखते ही उसकी आँखें भय और आश्चर्य से चौड़ी हो गईं—

आदित्य ने काँपती हुई आवाज़ में कहा— “रिया?!”

“नहीं… मैं लावण्या हूँ। लेकिन मुझे बताओ, उसके साथ क्या हुआ था?” लावण्या ने कहा

आदित्य की गहरी साँसें जैसे फ्रीज़ हो गई हों, उसकी आवाज़ कांप रही थी, और उसके शब्दों में अनजाना डर झलक रहा था—“तुम यहाँ नहीं आनी चाहिए थी। यह शहर… यह शहर तुम्हें ज़िंदा नहीं छोड़ेगा। रिया बहुत गहरे सच तक पहुँच गई थी… सच इतना काला और भयानक है कि वही तुम्हें भी निगल जाएगा।”

बार की ठंडी हवा अचानक और भी भारी लगने लगी, धुंध में परछाइयाँ अजीब रूप ले रही थीं। लावण्या ने महसूस किया कि यह सिर्फ चेतावनी नहीं थी—कोई या कुछ उनके चारों ओर छिपा था, उस अंधकार को जिंदा कर रहा था जो रिया को निगल गया था।

रिया आदित्य की बात हो रही थी की तभी अचानक, बार के दरवाज़े पर वह काले कोट वाला आदमी आ कर खड़ा हो गया। बारिश और धुंध में उसका रूप और भी भयानक लग रहा था, और अंधेरे में उसकी आँखें रक्तिम लाल चमक रही थीं, जैसे किसी नरभक्षी प्रेत की चेतावनी।

“रिया!” उसने गरजते हुए कहा, आवाज़ में भयानक क्रोध और बर्फ़ जैसी ठंडक थी। “तुम फिर से जिंदा नहीं रह सकती। तुम्हें मिटा दिया जाना चाहिए था।”

आदित्य ने कहा "हमें यहाँ से निकलना चाहिए" और दोनों तेज़ी से बार से बहार निकल गए।

लावण्या और आदित्य जैसे ही कदम तेज़ करते, वह काले कोट वाला आदमी उनके पीछे भूत की तरह बढ़ता रहा—उसके कदमों की आहट नहीं थी, बस ठंडी हवा की धार, जो उनकी गर्दन पर बर्फ़ का स्पर्श छोड़ती। गलियों की दीवारों पर उनकी छायाएँ फैलकर अजीबों-गरीबों रूप लेने लगीं—कहीं लंबी, कहीं विकराल, मानो अंधेरा खुद ज़िंदा होकर उनका मज़ाक उड़ा रहा हो।

चारों ओर का सन्नाटा टूटता तो सिर्फ़ हल्की-सी फुसफुसाहट से—जैसे न जाने कितनी अदृश्य आवाज़ें उनका पीछा कर रही हों। बारिश की बूँदें अब ठंडी चमक नहीं, बल्कि रक्त के कणों-सी लग रही थीं, जो चेहरे पर गिरकर डर को और गहरा कर रही थीं।

हर मोड़ पर ऐसा महसूस होता, मानो दीवारों से कंकाल जैसे हाथ बाहर आकर उन्हें पकड़ने को तैयार हों। लावण्या के कानों में धीरे-धीरे एक ही नाम गूँजने लगा—“रिया… रिया…”

दोनों कार में बैठे और तेज़ रफ़्तार में बारिश के पर्दे के पीछे गायब हो गए।

कार शहर की अँधेरी गलियों में दौड़ रही थी, बारिश की बूँदें जैसे शीशे पर खून की बूंदों की तरह चमक रही थीं। लावण्या का दिल तेज़ी से धड़क रहा था, और हर बार पीछे देखने पर उसे लगता की वह काले कोट वाला आदमी—जैसा कि कोई प्रेत—उन पर मंडराता दिखाई देता। उसकी लाल चमकती आँखें मानो उनके मन में डर की बीज बो रही थीं। 

आदित्य ने फुसफुसाते हुए कहा—“तुम्हें पता होना चाहिए, लावण्या… रिया ने जो रहस्य उजागर किया था, वो सिर्फ शहर तक सीमित नहीं था। यह एक नेटवर्क था—अंधेरे, शक्तिशाली लोग, जो अपनी साजिश को किसी कीमत पर छुपाते हैं। और अब तुम उसी जाल में फँसी हुई हो।”

लावण्या ने कार की खिड़की से बाहर झाँका। सड़कों पर अजीब परछाइयाँ घूम रही थीं, मानो उनके चारों ओर के अंधकार में भूतिया हाथ उन्हें पकड़ने को बढ़ रहे हों। अचानक, एक विशाल काली आकृति जो किसी लड़की की तरह दिख रही थी, उनके कार के आगे खुद पड़ी, उसे बचाने की कोशिश में कार ब्रिज पिलर से टकरा गयी। दोनों में पीछे मुड़ के देखा पर वहाँ कोई नहीं था, आदित्य ने कार रिवर्स करने के कोशिश की पर कार का टायर कॉनकॉरिट से बने स्पीड ब्रेकर में फँसा हुआ था। 

तभी अचानक उनके सामने के एक बाइक रुकी और उस पर से उतरा वही काले कोट वाला आदमी उसने उतरते ही दोनों पर गोलियाँ बरसाना शुरू कर दिया। 

“भागो! अब नहीं रुका जा सकता!” लावण्या ने चीख़ कर कहा, उसके भीतर डर और गुस्से की आग एक साथ जल रही थी। 

दोनों कार से निकले और आते-जाते गाड़ियों के बीच से बचते हुए वो बस पर चढ़ गए।

आदित्य और लावण्या जल्दबाज़ी में बस से उतरे और पुराने शहर की अंधेरी, सुनसान गली में घुस गए। हर कोना मानो किसी छुपे हुए खतरे की तरह थरथरा रहा था। अचानक आदित्य लड़खड़ाया और ज़मीन पर गिर पड़ा।

लावण्या झुककर उसे उठाने लगी, तभी उसकी आँखें सिहर उठीं—आदित्य के सीने से गर्म खून धार की तरह बह रहा था। उसके होंठ काँप रहे थे और दर्द के मारे उसका पूरा शरीर तड़प रहा था।

लावण्या ने घबराकर उसे संभालते हुए कहा—“हमें तुरंत अस्पताल चलना होगा… शायद तुम्हें गोली लगी है!”

आदित्य ने काँपती, टूटी हुई आवाज़ में कहा, “नहीं… हम अस्पताल नहीं जा सकते। वहाँ जाना मौत को दावत देना होगा।”

उसकी साँसें भारी हो चलीं। उसने लावण्या का हाथ कसकर पकड़ा, उसकी आँखों में एक आखिरी चमक थी, जैसे मौत से पहले का सच उगलना चाहता हो।

“लावण्या…” आदित्य की काँपती उंगलियाँ उसके हाथ में एक पुरानी, धूल से सनी हार्ड डिस्क और खून के धब्बों से सनी डायरी थमा रही थीं। उसकी साँसें टूट रही थीं, लेकिन आवाज़ में एक अजीब गूँज थी—मानो गली की दीवारें भी उसे दोहरा रही हों।

लावण्या ने पूछा "क्या है इसमें?"

“ये… यही वो सबूत हैं। इस हार्ड डिस्क और डायरी में उन सबका… काला सच छुपा है। गुम होने से पहले तुमने ही मुझे ये दिया था।” आदित्य ने कहा

“और सबसे आख़िरी सच…” उसकी आवाज़ खुरदुरी फुसफुसाहट में बदल गई, “ये है कि… तुम ही रिया हो। जितने लोगों से तुम अब तक मिली हो… सब उनके ही लोग थे। सबका मक़सद एक ही था—इस हार्ड डिस्क और डायरी को हासिल करना। तुम्हारा एक्सीडेंट… महज़ एक जाल था। उन्होंने तुम्हें मिटाने की कोशिश की… तुम्हारी यादें चुराने की कोशिश की। लेकिन तुम… बच निकलीं। और अब… अब वे परछाईयों से लौट आए हैं।”

लावण्या की आँखें चौड़ी हो गईं। आदित्य के शब्द उसके दिल पर हथौड़े की तरह बज रहे थे।

जैसे ही आदित्य के ये शब्द ख़त्म हुए, गली में ठंडी हवा का झोंका उठा। लावण्या को लगा मानो सैकड़ों अदृश्य आँखें अंधेरे से उसे घूर रही हों। 

लावण्या के हाथ काँप उठे। अब उसे समझ आ चुका था—सिर्फ़ उसका अतीत ही नहीं, बल्कि उसकी हर सांस, उसकी हर धड़कन… इस खेल का हिस्सा थी।

गली अब अंधेरे की क़ैद बन चुकी थी। बरसात का पानी नालियों में खून जैसा बह रहा था और हवा में फफूँद और सड़ांध की गंध घुली थी। अचानक, आस-पास की टिमटिमाती लाइटें बुझ गईं, और अंधेरे में दीवारों से धीमी फुसफुसाहट गूंजने लगी—“हार्ड डिस्क… डायरी… लौटा दो…” लावण्या उर्फ रिया के सामने वही काले कोट वाला आदमी आ पहुँचा था। उसकी लाल आँखें अंगारों की तरह धधक रही थीं और हाथ में एक लोहे की रॉड चमक रही थी। 

“रिया… यह खेल यहीं ख़त्म होता है,” वह गुर्राया, और अगले ही पल रॉड उसकी कनपटी पर पड़ी। एक चीख़ उसके होंठों तक आई, मगर लावण्या ज़मीन पर गिरते ही बेहोशी की गहराई में डूब गई।

लेकिन तभी—हवा में अजीब कंपन फैल गई। गली की दीवारों पर परछाइयाँ नाचने लगीं। बिजली कौंधी और उसी पल रिया की आत्मा—भय और प्रतिशोध से जलती हुई—लावण्या के शरीर में उतर आई। उसकी आँखें अब लाल लौ की तरह चमक रही थीं, और चेहरा विकराल क्रोध से विकृत हो चुका था।

“तूने मुझे मिटाने की कोशिश की थी…” एक दोहरी, गूँजती आवाज़ उसके होंठों से निकली—लावण्या और रिया की आत्मा का संगम।

“अब मैं ही तेरा अंत बनूँगी!”

काले कोट वाले आदमी ने रॉड घुमाई, लेकिन लावण्या-रिया ने उसे नंगे हाथों से पकड़ लिया। रॉड चटक गई, और चारों ओर से अजीब छायाएँ चीखने लगीं। गली का अंधेरा जैसे आग में बदल गया। हवा में टूटते कांच की आवाज़ें गूँजने लगीं, और गली के दरवाज़े खून से टपकते प्रतीत हुए।

लड़ाई भयानक थी—काले कोट वाले आदमी का हर वार मानो अलौकिक शक्ति से भरा था, लेकिन रिया की आत्मा से लैस लावण्या उससे कई गुना प्रबल थी। उसने आदमी को दीवार पर पटक दिया; उसकी चीख़ इतनी भयावह थी कि गली में कौवों का झुंड एक साथ उड़ पड़ा।

आख़िरकार, लावण्या ने उसके सीने में डायरी से निकले लोहे के पन्ने को भोंक दिया। आदमी की आँखें फैल गईं, उसका शरीर राख की तरह बिखर गया, और गली में एक भयानक सन्नाटा छा गया।

सुबह होते ही, लावण्या ने अपने शरीर में रिया की आत्मा के साथ आख़िरी काम पूरा किया। वह सीधे अपने न्यूज़ चैनल के दफ़्तर पहुँची। खून और बारिश से भीगा हुआ शरीर, मगर आँखों में लोहे-सा संकल्प।

उसने हार्ड डिस्क ऑन-एयर चला दी। टेलीविज़न स्क्रीन पर पूरे देश ने देखा—भ्रष्टाचार, तस्करी, और माफ़िया नेटवर्क की असलियत। नेताओं से लेकर पुलिस तक, हर किसी का काला सच जनता और दुनिया के सामने आ गया। इसके बाद पूरा शहर उस काले रैकेट के अंत का गवाह बना। माफ़िया सिंडिकेट ढह गया। भ्रष्ट सरकार टूट गयी, देश का माहौल न बिगड़े और शांति बने रहे इसलिए हर राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया। शहर भर में कर्फ्यू लगा दिया गया। और यह सिलसिला महीनो तक चला। 

रिया खिड़की के पास खड़ी थी। बाहर हल्की बारिश हो रही थी, और ठंडी हवा काँच से टकराकर अजीब-सी फुसफुसाहट कर रही थी। उसके हाथ में कॉफ़ी का कप था, लेकिन उसकी आँखें खाली थीं—मानो किसी गहरी खाई में झाँक रही हों।

अचानक दरवाज़ा खुला। उसकी ऑफिस की सहकर्मी आशिमा कमरे में दाख़िल हुई।

“रिया… तुम कहाँ थीं पूरे एक साल तक?हमने तुम्हें ढूंढ़ने की कितनी कोशिश की थी” । उसकी आवाज़ में हैरानी भी थी और थोड़ी झुंझलाहट भी।

रिया धीरे से मुड़ी। उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान उभरी, मगर वह अजीब और खोई हुई थी।

“मुझे… नहीं पता,” उसने फुसफुसाकर कहा। “मुझे उस रात से पहले कुछ भी याद नहीं… जब मैं ऑफिस पहुँची थी। न मैं कहाँ थी, न मैं कैसी थी… सब खाली है। बस… अंधेरा।”

आशिमा ने उसकी ओर देखा। “तुम कहना क्या चाहती हो? एक साल… ऐसे ही गायब?”

रिया की उँगलियाँ काँप रही थीं। कप से उठती भाप जैसे धुंध में बदलकर उसके चारों ओर लिपट रही थी। “कभी-कभी… खिड़की पर खड़ी होती हूँ तो लगता है… कोई और मेरी परछाई में साँस ले रहा है। कोई और… मेरी आँखों से देख रहा है।”

कमरे की लाइट अचानक टिमटिमाई। दीवार पर रिया की परछाई खिंच गई—लेकिन वह परछाई मुस्कुरा रही थी, जबकि रिया का चेहरा बिल्कुल भावशून्य था।

आशिमा हड़बड़ा कर पीछे हटी। “रिया… तुम्हारी… शैडो?”

रिया ने धीरे से कप टेबल पर रखा। उसकी आवाज़ अब और भी भारी और ठंडी हो गई—

“शायद… वो साल मैंने जिया ही नहीं। शायद… कोई और मेरे भीतर जिया था।”

कॉफ़ी का कप अचानक फर्श पर गिरा और टुकड़ों में बिखर गया। उसके साथ ही कमरे में ठंडी हवा का झोंका आया, और दोनों को महसूस हुआ—खिड़की पर अब दो परछाइयाँ खड़ी थीं और खिड़की पर खून से लिखा था "लावण्या"



क्या आपको लगता है कि रिया की यादें सच में खो गईं… या उसके पीछे कोई और डरावना सच छुपा है? अपनी राय कमेंट में लिखें 

ऐसी ही सिहरन पैदा कर देने वाली कहानियों के लिए Follow करें Bhoot Kahani

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ