सपना
पहला डरावना सपना मायरा को एक तूफ़ानी रात को आया। बाहर आसमान में गरजते बादल और चीखती हवाएँ मानो उसके मन के भीतर उठ रहे अँधेरे तूफ़ान की परछाईं बन गई थीं। खिड़की के शीशे लगातार काँप रहे थे, जैसे कोई अदृश्य हाथ उन्हें बार-बार खटखटा रहा हो।
अचानक, खिड़की के बाहर लटकते पेड़ की शाखाएँ इस तरह टकराने लगीं, जैसे कोई नाखूनों से काँच को खरोंच रहा हो। हर बार की खटखटाहट के साथ ऐसा लगता, मानो कोई अंधेरे में खड़ा अंदर आने की जिद कर रहा हो। बिजली की चमक के बीच मायरा को पलभर के लिए खिड़की पर एक परछाईं दिखी—लंबी, टेढ़ी-मेढ़ी, जिसकी आँखें जलती हुई कोयलों जैसी लाल चमक रही थीं।
हवा इतनी तेज़ थी कि लगता था जैसे पूरा घर किसी अदृश्य शक्ति के बोझ तले कराह रहा हो। दरवाज़े चरमराए, दीवारें हिलने लगीं और छत पर से किसी के दौड़ने की आवाज़ आई—भारी और अस्वाभाविक।
मायरा ने घबराकर आँखें भींच लीं। लेकिन उसके कानों में अब भी धीमी-धीमी फुसफुसाहट गूँज रही थी—जैसे कोई उसका नाम ले रहा हो। उस पल उसे यक़ीन हो गया कि बाहर सिर्फ़ तूफ़ान नहीं था…कुछ और भी था, जो उसे देख रहा था।
मायरा हमेशा से हल्की नींद लेने वाली थी, ज़रा-सी आवाज़ या तापमान में बदलाव उसे जगा देता था। लेकिन उस रात कुछ अलग था। इतना शोर गुल होने के बावजूद जब मायरा ने आँखें बंद की तो नींद ने उसे अपनी आगोश में लिया मानो जैसे किसी ने उसे अचानक गहरे अँधेरे तालाब में धकेल दिया हो, वैसी नींद आई। नींद के भीतर अँधेरा और गहरा होता चला गया। उसे लगा मानो पानी के नीचे कोई ठंडी, बर्फ़ीली उंगलियाँ उसके टखनों को पकड़ रही हों और धीरे-धीरे नीचे खींच रही हों।
उसी नींद में उसने अपने को एक उजड़े हुए, मरते हुए संसार में पाया। उसके सपने का आसमान लाल और काले रंग की उग्र लहरों से भरा हुआ था। सूरज मुरझाए अंगारे-सा दूर, बुझती हुई लौ की तरह टिमटिमा रहा था। ज़मीन उजाड़ थी—बिखरे हुए शहरों की हड्डियाँ चारों ओर बिखरी थीं। टूटी-फूटी इमारतें भूतिया परछाइयों की तरह खड़ी थीं, गाड़ियाँ उलटी पड़ीं, और सड़कें गहरे, रिसते ज़ख़्मों जैसी फटी हुई थीं।
हवा भारी और दम घोंटने वाली थी—मानो वह भी ज़िंदगी ढोते-ढोते थक चुकी हो। उसमें सड़न के साथ एक लोहे जैसी तीखी गंध घुली हुई थी, जैसे किसी ने खून और जले हुए मांस को आग में झोंक दिया हो।
कभी-कभी उस वीराने में लोहे के रगड़ने जैसी भयानक आवाज़ गूँजती, जैसे अदृश्य जंजीरें ज़मीन पर घसीटी जा रही हों। टूटी इमारतों की दरारों से अजीब-सी फुसफुसाहटें रिसतीं—मानो किसी ने हज़ारों साल पुराने श्राप उन दीवारों में कैद कर दिए हों।
और दूर, गाढ़े अंधेरे में, दो चमकती हुई पीली आँखें धीमे-धीमे खुलतीं और तुरंत ही गायब हो जातीं, जैसे कोई नज़रें मिलाकर फिर परछाइयों में छुप गया हो।
मायरा की साँसें तेज़ हो गईं। उसे लग रहा था कि यह सुनसान दुनिया सिर्फ़ बेजान खंडहरों की नहीं थी, बल्कि उसमें कोई जीवित अँधेरा भी था, जो उसके हर कदम को देख रहा था।
और तभी, "वे दिखे.....!!!"
पहले तो मायरा उनके चेहरे पहचान ही नहीं पाई। इंसानी शक्ल के जैसे दिखते थे, पर मानो किसी ने इंसान की छवि याद से बनाई हो और चेहरे की सबसे ज़रूरी बातें भूल गया हो। उनकी शक्ल पर न आँखें थीं, न मुँह—बस गहरे काले गड्ढे, जहाँ आँखें होनी चाहिए थीं। उन गड्ढों से ठंडी धुंध सी रिसती रहती, जैसे किसी अनजाने कुएँ से अंधेरा बहकर बाहर आ रहा हो। उनकी चाल अजीब-सी थी, हड्डियों के चटकने जैसी आवाज़ के साथ, जैसे शरीर पर उनका काबू ही न हो।
मायरा ने महसूस किया कि उनके आसपास की हवा ठंडी पड़ रही है..!
मायरा भागी। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था, साँसें टूट रही थीं, फिर भी जितना भागती, वे उतना ही उसके पीछे होते। वे बेहद तेज़ थे। बहुत तेज़। उनकी चाल भले ही टूटी-फूटी लगे, मगर पलक झपकते ही वे नज़दीक आ जाते।
हर कदम के साथ वे अपने आस-पास से ज़िंदगी को खींच रहे हों। पेड़ों की सूखी टहनियाँ उनके पास आते ही सड़कर राख हो जातीं, और ज़मीन पर मौजूद पानी काला होकर उबलने लगता। उनके चेहरे हमेशा उसकी ओर मुड़े रहते, मानो बिना आँखों के भी उसे देख सकते हों। और सबसे डरावनी बात—वे बिल्कुल खामोश थे। न कोई आहट, न कोई आवाज़। बस उनकी मौजूदगी का डरावना बोझ, जो उसका पीछा किए जा रहा था।
चीखते हुए वह नींद से जागी। बदन पसीने से भीगा था, दिल अब भी काँप रहा था। बाहर का तूफ़ान थम चुका था, पर भीतर की सन्नाटे ने उसकी रूह तक को जमा दिया। मायरा ने खुद को समझाया—“ये बस सपना था…” लेकिन उसके दिल की गहराई में कहीं न कहीं एहसास था कि यह कोई आम सपना नहीं था।
खौफनाक सच
दिन बीतते गए। मायरा की ज़िंदगी अपने बेरंग, सामान्य ढर्रे पर लौट आई—ऑफ़िस का काम, रोज़मर्रा की भाग-दौड़, लोगों की हल्की-फुल्की बातों की आवाज़ें। सपना धीरे-धीरे धुँधला पड़ने लगा, जैसे कोई भूतिया परछाई धीरे-धीरे उसकी चेतना से दूर हो रही हो। लेकिन फिर एक रात वह सपना दोबारा आया।
फिर दूसरी रात...., तीसरी हर रात....,अब हर रात वह सपना मायरा को आता गया और
हर बार सपना और भयानक होता गया। बिना चेहरे वाले लोग बढ़ते गए और बढ़ते ही जा रहे थे—जैसे उनके अँधेरे से बने शरीर और भी ठोस हो रहे हों। कभी-कभी मायरा को जागते हुए भी उनकी ठंडी, बर्फ़ जैसी निगाह महसूस होने लगी, मानो वे उसके अंदर तक झाँक रहे हों। उजड़े शहर, टूटी मशीनें, और मर चुकी दुनिया की खामोशी उसके सपनों में बार-बार लौट आती, पर अब सिर्फ़ दृश्य ही नहीं—साँस लेने वाली हवा में भी सड़ी-गली गंध घुल रही थी।
कभी-कभी उसे लगता जैसे वे लोग उसके कान के पास फुसफुसा रहे हों, लेकिन कोई शब्द नहीं सुनाई देता, सिर्फ़ धीमी, खुरदरी हँसी की गूँज। सड़कें उसकी कदमों के नीचे टूटती और फटती दिखतीं, और दूर कहीं से किसी टूटी हुई घंटी की आवाज़ आती—जो बस डर पैदा करती रही। हर बार सपने में हवा के साथ किसी अदृश्य शक्ति का हल्का खींचाव महसूस होता, जैसे कोई उसे गले लगाकर भीतर खींच रहा हो, इस उजड़े, मरते हुए संसार की ओर।
मायरा समझ गई थी—यह सिर्फ़ सपना नहीं था। यह कहीं गहरे और भयानक सच का अंश था, जो उसकी नींद में धीरे-धीरे आकार ले रहा था।
वह खुद को समझाती—“शायद काम का तनाव है… या कुछ गलत खा लिया होगा।” लेकिन अंदर का डर धीरे-धीरे उसकी रूह में जड़ जमा रहा था। हर बार जब वह सोती, उसे लगता—कोई अदृश्य ताकत उसे इस उजड़े, बर्बाद और खामोश संसार की ओर खींच रही है। हवा में गूँजती फुसफुसाहट, टूटी-फूटी इमारतों की चुप्पी, और उस अजीब ठंडी निगाह की याद उसे नींद में भी नहीं छोड़ती। जैसे सपना सिर्फ़ सपना नहीं रहा, बल्कि उसका अस्तित्व धीरे-धीरे इसी मरते हुए संसार में समा रहा हो।
फिर एक दिन, सपनों और हक़ीक़त की दीवार टूट गई।
शाम को ऑफिस से लौटते समय, भीड़ भरी सड़क पर उसने उन्हें देखा। वही सपने वाले बिना चेहेर के लोग जो ज़िंदा लोगो के बीच घूम रहे थे, और तभी अचानक एक आदमी—नहीं, एक साया—मायरा से कुछ दुरी पर खड़ा था। चेहरा बिल्कुल सपनों जैसा—बिना आँखों का, सिर्फ़ गहरे काले गड्ढों वाले, मानो किसी ने उसकी आत्मा को उखाड़ लिया हो। हवा ठंडी पड़ गई और आसपास की हल्की-सी रोशनी अचानक फीकी पड़ गई, जैसे अंधेरे ने शहर को निगल लिया हो।
दिल दहल गया। मायरा ने सोचा, शायद भ्रम है। लेकिन वह वहीं खड़ा रहा, जैसे वह जम गया हो। लोग उसके आसपास गुज़रते रहे, पर किसी ने उसे देखा ही नहीं। उसके कदमों की आहट गायब थी, पर वह हर पल उसके मन की धड़कन में गूँज रहा था।
अचानक वह हिला। उसकी गर्दन अजीब तरीके से टेढ़ी हुई, मानो मनोवैज्ञानिक ट्रेजिडी का अक्स दिखा रहा हो। और फिर उसकी चाल—धीमी, मगर ज़हर भरी—मायरा की ओर बढ़ी। तेज़ी इतनी थी कि उसकी आंखों के सामने सब कुछ धुंधला पड़ गया। हवा में अचानक किसी ने उसके कान में फुसफुसाया—“अब भागने का समय खत्म हो गया…”
मायरा के शरीर में ठंडी सनसनी दौड़ गई, उसके पैरों ने अपने आप कदम पीछे खींचने शुरू कर दिए। चारों तरफ़ अजीब, साये जैसी हलचलें बढ़ गईं—जैसे अंधेरे की आत्माएँ उसके चारों तरफ़ जमा हो गई हों। उसके होंठों से बस हफ़्ते भर की खामोशी फूट रही थी। उसके दिमाग़ में अजीब सी खलबली मच गई—सब कुछ अचानक सन्नाटे में डूबा हुआ महसूस हुआ। वह हर उस आवाज़ को सुन रही थी, जो अब तक अनसुनी लगी थी—टूटी मशीनों की चुभती खुरदरी आवाज़, खाली सड़क की घनी सन्नाटे की गूँज, और कहीं दूर से आती धीमी फुसफुसाहट।
हर बार जब उसने आँखें बंद कीं, उसे लगता जैसे कोई अदृश्य हाथ उसे पीछे खींच रहा हो, और अब ये खिंचाव और भी तेज़ और ज़बरदस्त लग रहा था। उसकी नींद, उसके सपनों और हक़ीक़त की सीमाएँ धुंधली होने लगीं।
और तभी, वहाँ पास खड़े बिना चेहरे वाले आदमी ने कहा
"मरे हुए लोग..!!"
इतना सुनते की मायरा की नींद एक झटके से टूट गयी, और फिर उसका सामना हुए उस डरावने सच से जिसको वह अब तक एक भयानक सपना समझ रही थी।
मायरा ने चारों ओर देखा—सन्नाटा, उजड़े शहर की टूटी-फूटी इमारतें, और उनके चारों ओर मंडराती उन बिना चेहरा वाले प्राणियों की खामोश मौजूदगी। हवा में सड़न और धूल की गूँज थी, और हर कदम पर ऐसा लगता जैसे ज़मीन उसके पैरों के नीचे धीरे-धीरे खुद को निगल रही हो। उसकी सांसें तेज़ और भारी हो गईं, हृदय ऐसे धड़क रहा था मानो हर पल फट सकता हो।
यह दुनिया, यह उजड़ा, निर्जीव और खतरनाक संसार ही उसकी हक़ीक़त थी। और वे प्राणी—जिन्हें वह डरावने सपनों का हिस्सा समझती रही—वास्तव में उसके जागते जीवन के प्रहरी थे। उनका मकसद सिर्फ़ एक था—मायरा की नींद तोड़ना, उसे इस सच्चाई का एहसास दिलाना, और उसे उस दुनिया से रूबरू कराना जो उसके सपनों से भी अधिक भयावह थी।
मायरा अब तक जिसे अपनी ज़िन्दगी समझती रही थी—ऑफ़िस, नौकरी, रोज़मर्रा की नार्मल लाइफ —सब एक भयानक झूठ का हिस्सा था। एक लंबा, गहरे अंधेरे सपने जैसा। असली दुनिया यही थी
अब कोई रास्ता पीछे लौटने का नहीं था।
सपना ख़त्म हो चुका था।
मायरा ने एक आखिरी बार चारों ओर देखा, सन्नाटे में हर चीज़ उसके इर्द-गिर्द घूम रही थी। और तभी एक सवाल उसके दिमाग़ में गूंजा—
"क्या वह सच में इस दुनिया में है … या यह सिर्फ़ अब भी एक और गहरा सपना है?...!!"
यही सोचते -सोचते मायरा उस प्रहरी के साथ अपनी नियति की और पड़ी...!!!
कौन थी मायरा?
मायरा एक क्रिस्चियन लड़की थी और शुरू में अपनी ज़िंदगी को खुशहाली और उम्मीदों के साथ जी रही थी। लेकिन समय हमेशा एक सा नहीं रहता। बुरा समय धीरे-धीरे उसके जीवन में घुस आया और उसकी सारी खुशियाँ छीन ले गया। कोरोना काल में उसके माँ-बाबा की मौत हो गई, कंपनी बंद होने की वजह से उसकी नौकरी चली गई, और सबसे ज़्यादा टूटन उसके प्यार और शादी के टूटने से आई।
उसके दोस्त और रिश्तेदार भी धीरे-धीरे दूर हो गए, मानो उन्होंने उसे भुला ही दिया हो। महीनों की अकेलापन, निराशा और गहरे डिप्रेशन ने मायरा को इस क़दर कमजोर कर दिया कि उसने अपनी रूह को इस दुनिया से अलग करने का सबसे अंतिम कदम उठाया—खुदखुशी कर ली।
लेकिन उसके लिए डरावनी सच्चाई अब शुरू हो रही थी। क्रिश्चियन मान्यताओं के अनुसार, जो लोग खुदखुशी करते हैं उनकी रूह को नर्क की ओर ले जाया जाता है, जहाँ वे अनंतकाल तक फँसकर अपनी गलतियों और दुखों का बोझ उठाते रहते हैं। और मायरा के साथ भी यही हो रहा था—उसकी आत्मा अब उस भयानक, अंधेरे और अनंतकालीन पिंजर में फँस गई थी, जहाँ न कोई दया थी, न कोई राहत।
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