पतझड़ हमेशा से अवनी का सबसे पसंदीदा मौसम रहा। ठंडी हवा, पेड़ों की सुनहरी और लाल रंग की चादर, और गिरते पत्तों की खनक उसे अजीब सा सुकून देती थी। लेकिन इस साल यह मौसम कुछ ही अलग था, वजह थी उसकी दादी, जो कभी हर किसी के चेहरों पर मुस्कान बिखेरती थीं, अब इस दुनिया में नहीं रही। अवनी के माँ-बाबा का देहांत पहले ही हो चूका था, जब अवनी महज दो साल की थी तबसे उसकी देख भाल उसकी दादी ने ही की थी। दादी के गुज़रते ही सारे रिश्तेदारों ने ज़मीन जायदाद का बटवारा किया और अवनी को गाँव के पुराने घर को हिस्से में देते हुए उसको अकेले छोड़ दिया। अवनी को अपने परिवार के पुराने गाँव लौटना पड़ा—एक ऐसा गाँव जिसे लोग अब भूल चुके थे।
जब अवनी गाँव पहुंची तो वहाँ का नज़ारा देखकर थोड़ी सेहम सी गयी। गाँव समय की आंखों से छूट गया लगता था। संकरी गलियाँ, लकड़ी के पुराने घर जिनका रंग उतर चुका था और खिड़कियाँ धूल और मकड़ी के जाले से ढकी थीं, जैसे अंदर कोई छिपा बैठा हो। हवा में मिट्टी और सड़ी पत्तियों की गंध घुली थी, और दूर से कभी-कभी कर्कश कौवों की काली परछाइयाँ पेड़ों पर नाचती दिखती थीं। कुछ ही लोग दिखाई देते, और वे उसे देखकर डर और संकोच से कांप उठते। ऐसा लगता था जैसे कोई बाहरी आदमी यहाँ कदम भी नहीं रखता, और रात के समय तो मानो गलियाँ खुद में कुछ फुसफुसाती हों। गाँव के पुराने कुएँ और बंजर आँगन अजीब सन्नाटे में डूबे थे, और ऐसा प्रतीत होता था कि उसकी दादी की तरह अकेलेपन को अपनाने वाले परिवार के लोग यहाँ लंबे समय से किसी रहस्य या आत्मा के डर से छुपे हुए हैं।
गाँव की बेजान और डरवाने माहौल से गुज़रते हुए अवनी पहुंची अपनी दादी के घर। उसकी दादी का घर गाँव के किनारे, पुराने बड़ के पेड़ और घने, छायादार जंगल के सामने खड़ा था। घर अभी भी वैसा ही था जैसा उसने एक फोटो एल्बम में देखा था, लेकिन अब वह और भी डरावना लग रहा था। छत थोड़ी झुकी हुई थी, आँगन जंगली और बेजान था, और हर खिड़की से अजीब सी परछाइयाँ झाँकती थीं, मानो कोई अज्ञात निगाह भीतर देख रही हो। घर के चारों ओर फुसफुसाती हवाएँ चल रही थीं, और कभी-कभी दूर से लोहे की पुरानी झूलियों की चरमराहट सुनाई देती थी, मानो कोई अतीत की आत्मा अपना खेल खेल रही हो। दीवारों की दरारों से धूल गिर रही थी और पुराने फर्नीचर पर मकड़ी जाल जमी थी। यह शांति—जो कभी सुखद थी—अब घबराहट पैदा कर रही थी, जैसे घर खुद किसी रहस्यमय शक्ति से भरा हो, और हर कोना किसी अज्ञात चीज़ का इंतजार कर रहा हो।
पहला दिन उसने घर में पुराने फर्नीचर, छायेदार दीवारों और लकड़ी की मद्धम खुशबू को देखकर बिताया। लेकिन जैसे-जैसे रात हुई, वह शांति उसे सघन और घुटन भरी लगने लगी। हर फर्श की चरमराहट, हर खिड़की पर हवा की हलचल, मानो किसी अदृश्य हाथ की फुसफुसाहटें उसे सुनाई दे रही हों। कभी-कभी दीवारों से अनजान सरसराहटें आतीं, और फर्नीचर अपने आप हल्का सा हिलता हुआ दिखाई देता। छत से टपकते पानी की बूंदें मानो किसी ध्वनि में बदल रही थीं—हलक़े कानफोड़ने वाले फुसफुसाहट जैसी। कमरे के कोने अजीब-सी परछाइयाँ नाच रही थीं, और कभी-कभी ऐसा लगता जैसे कोई उसके कदमों की आवाज़ें पीछे-पीछे आ रही हों, लेकिन मुँह मोड़ते ही वहाँ कुछ भी नहीं होता। शांति अब सुखद नहीं, बल्कि भयावह और लगातार निगरानी की भावना देने लगी थी।
दूसरे दिन, आँगन की तरफ जाते हुए अवनी को कुछ अजीब सा महसूस हुआ। तभी उसकी नज़र बगीचे के तरफ गयी वह बगीचे में पहुंची—जो कभी दादी का गर्व था, गुलाब, हर्ब्स और सूरजमुखी से भरा हुआ। अब वहाँ केवल जंगली, बेतरतीब उगी झाड़ियाँ और सूखे पत्तों की चादर थी, वहाँ की हवा में मिट्टी और सड़ते पत्तों की गंध घुली थी। कहीं-कहीं जमीन पर हल्की-हल्की धुंध जैसी चीज़ फैल रही थी, जैसे किसी ने जमीन और हवा के बीच रहस्य फैला रखा हो।
जमीन पर चलते-चलते उसका पैर किसी कठोर चीज़ से टकराया और वह गिर पड़ी। गिरते ही झाड़ियों में छुपे काले और अजीब-सी चमक वाले कीड़े इधर-उधर भागे। पीछे मुड़कर देखा तो मिट्टी में एक पत्थर की किनारी झांक रही थी। झाड़ियों और कंटीली बेलों को हटाते हुए उसने देखा—यह एक अनजान कब्र थी। उस कब्र के पत्थर पर कोई नाम, कोई तारीख, कोई निशान नहीं था, लेकिन मिट्टी में हल्की-हल्की छापें और पुरानी राख जैसी धब्बे साफ़ साफ़ दिखाई दे रहे थे।
हवा के साथ अजीब सी फुसफुसाहटें भी सुनाई देने लगीं—जैसे कोई उसे चुपचाप पुकार रहा हो। पेड़ों की शाखाएँ अपने आप चरमराने लगीं, और कब्र के आसपास की हवा अचानक ठंडी और भारी हो गई। जैसे ही अवनी ने झुककर कब्र को देखा, उसके शरीर में एक अजीब सिहरन दौड़ गई—यह कोई साधारण जमीन नहीं थी, बल्कि किसी पुरानी आत्मा या रहस्य की सीमा लग रही थी।
सर्दी की एक तेज़ लहर उसके रीढ़ की हड्डी तक चली गई, जैसे किसी ने अपने हाथों से उसे छू लिया हो। दादी ने कभी इसका जिक्र क्यों नहीं किया? कौन यहाँ दफन था? आँगन अब छोटा, घना और भयावह लगने लगा; पेड़ों की लंबी परछाइयाँ जैसे जीवित हों और उसके चारों ओर धीमी गति से हिल रही हों। कहीं-कहीं पत्तियों में हल्की चमकती परछाइयाँ नाच रही थीं, और हवा में अजीब सी फुसफुसाहटें घुल रही थीं—जैसे कोई अदृश्य प्राणी उसका पीछा कर रहा हो।
और फिर उसी रात से शुरू हुईं — फुसफुसाहटें।
पहले अवनी ने सोचा ये सब हवा की वजह से हो रहा है। घर हर झोंके में चरमराता, फर्नीचर हल्का सा हिलता, और दीवारों पर अजीब-सी परछाइयाँ झूलती। लेकिन धीरे-धीरे आवाजें साफ़ सुनाई देनी लगी — जो उसका नाम पुकार रही थीं,
“अवनी… अवनी…”
ये आवाज़ें साधारण नहीं, बल्कि भयंकर और बेहद डरावनी थी।
हॉलवे की दीवारों पर झलकती परछाइयाँ उसे डराती रही। फुसफुसाहटें इतनी करीब लग रही थीं उसका पता लगाने के लिए वह खिड़की तक भागी, लेकिन बाहर केवल पेड़ों की हिलती परछाइयाँ थीं।
रात और गहरी होती जा रही थी, कमरे में हल्की चांदनी छन रही थी, भारी परदों से झरकर दीवारों पर भटकती परछाइयाँ बन रही थीं, और कहीं-कहीं दरवाजों की चरमराहटें अचानक तेज़ हो जातीं। पंखे की हल्की खड़खड़ाहट और बारिश की बूंदों की आवाज़ में भी उसका नाम गूँजता सुनाई देता। हवा में हल्की कोहरा जैसी परत फैली थी, और कमरे का हर कोना मानो किसी पुरानी आत्मा की निगरानी में था। उसने खुद को मनाया कि ये उसका भ्रम है, कब्र की खोज और बरसात की रात का असर। लेकिन उसके दिल में अब एक अनजाना डर और घबराहट गहराई से बैठ गया था।
रात दर रात, फुसफुसाहटें तेज़ होती गईं, और अब वे केवल उसके कानों तक ही नहीं, बल्कि कमरे की दीवारों और फर्श में गूँजती लग रही थीं। अवनी ने मंदिर की घंटियों की रिकॉर्डिंग चलाई, दीपक जलाए, और कान में रुई डाली—लेकिन सब बेअसर रहा। आवाजें उसके दिमाग में गहराई से घुस चुकी थी और उसकी हर रात की नींद चुराने लगी।
बाहर बरसात की बूंदें तेज़ हो रही थीं, और पेड़ों की शाखाएँ अचानक चरमराकर खिड़कियों पर जोर से टकरातीं—ऐसा लगता जैसे कोई अदृश्य हाथ उसे खींचने की कोशिश कर रहा हो। कभी-कभी हल्की रोशनी में कमरे के कोने अजीब परछाइयाँ हिलतीं, मानो किसी ने उस पर नजर गड़ाई हो। दीवारों से अनजान सरसराहटें आतीं, और छत से टपकती बूंदें अचानक एक भूतिया ताल की तरह गूँजतीं।
उसके दिल में अब केवल डर नहीं, बल्कि सन्न कर देने वाला सिहरन और निगरानी की भावना भी घर करने लगी थी। हर झोंके के साथ वह महसूस करती कि कोई या कुछ उसके आसपास घूम रहा है, पर दिखाई नहीं देता। कमरे का हर कोना अब उसके लिए खतरनाक, जीवित और अजीब तरह से दुश्मन बन चुका था।
पांचवीं रात को, उसने आखिरकार तय कर लिया की अब उसे सच्चाई जाननी है। कब्र, फुसफुसाहटें—आखिर इनका क्या रहस्य है? उसने पुराने, जंग लगी कुदाल बाग़ से उठाई और ठंडी, भरी बारिश की रात में बैकयार्ड की ओर बढ़ी। हवा में मिट्टी और सड़ी पत्तियों की गंध घुली हुई थी, और पेड़ों की शाखाएँ जैसे किसी अदृश्य शक्ति से हिल रही थीं।
कब्र के सामने खड़ी होकर उसने कहा
"तू ही सब फसाद की जड़ है", अब, फुसफुसाहटें—जो हर झोंके, हर कोने, और हवा की लहर में मौजूद थीं—उसे आगे बढ़ने को कह रही थीं।
“अवनी… तुम्हें जानना होगा आखिर क्या दफन है इस ज़मीं के नीचे… खोदो…”
मिट्टी कड़ी और गीली थी, जैसे इसमें कोई प्राचीन शक्ति छुपी हो। उसने जोरों से खोदना शुरू किया। पसीना उसके चेहरे और हाथों पर बह रहा था, हाथ दर्द से अकड़ रहे थे। बारिश की बूंदें उसके बालों और चेहरे पर टपक रही थीं, और बिजली की झलकियाँ आसमान में चमक रही थीं, जिससे काले बादल और भूतिया रूप में दिखाई दे रहे थे।
तभी कुदाल किसी ठोस चीज़ से टकराई, बिजली और भयानक गरगराहट से साथ कड़की। वह चीज़ लकड़ी नहीं थी—धातु थी। एक अजीब, सिज़लिंग आवाज़ हुई, जैसे जमीन और धातु में किसी पुरानी आत्मा का प्रतिरोध हो।
झुककर अवनी ने मिट्टी हटाई—एक छोटा, जंग लगा बॉक्स सामने आया। काँपते हुए उसने उसे खोला। अंदर एक डायरी थी, जिसकी चमक भी कुछ अलग तरह की थी—पुरानी, लेकिन किसी अजीब जीवन से भरी। मिट्टी और बारिश की बूंदों के बीच डायरी से निकलती हल्की खुशबू मानो भूतिया आत्माओं की मौजूदगी का संकेत दे रही हो।
डायरी ने उसकी हर चाल, कब्र की खोज, रातों में गूँजती फुसफुसाहटें और उसके भविष्य में होने वाली मृत्यु तक की भयावह भविष्यवाणी कर दी थी। डायरी के पन्नो को अवनी जल्दी जल्दी पलट रही थी उस जानना था की ये किसकी डायरी पर कुछ नहीं मिला। मिली तो सिर्फ चेतावनियाँ
आखिरी पन्नों पर लिखा था:
“मैं यहाँ फँसी हूँ। और जल्द ही, तुम भी यहाँ फँस जाओगी।”
और सबसे डरावनी बात—सबसे बड़ा खतरा कोई अजनबी नहीं था। बल्कि उसकी—खुद उसकी परछाई थी, लेकिन विकृत, पीली, कंकाल जैसी त्वचा वाली, खोखली आंखों में अंधेरे का घिनौना प्रकाश, और वही सिहरन पैदा करने वाली मुस्कान, जो डायरी में आखिरी पन्नों पर बनी हुई थी।
यह देखकर अवनी के हाथ कांप गए। उसने डायरी फेंकी और कमरे के तरफ भागी घर के अंदर बिलकुल ख़ामोशी छाई थी बाहर हो रही बारिश और बिजली के कड़कने की आवाज़ भी मानो गूंगी हो गयी हो। अंदर और बाहर की फुसफुसाहटें अब थम गई थीं, पर सन्नाटा इतना घना और गहरा था कि हर साँस डरावनी लग रही थी। कमरे के कोने-कोने में परछाइयाँ अचानक हिलतीं, और दीवारों की दरारों से अजीब आवाजें आ रही थीं। जैसे कोई उसके नाम को धीरे-धीरे पुकार रहा हो।
हॉलवे से चरमराहट और धीमी, कदमों की गूंज आई। सीढियों से ऊपर भागती अवनी रुक गई, उसकी सांसें फँस सी गईं थी। वह धीरे-धीरे मुड़ी और उसने देखा
दरवाजे पर खड़ी—उसकी परछाई या परछाई की रूप में शैतान। हवा ठंडी और गीली हो गई, बारिश की बूंदें खिड़कियों पर जैसे खौफनाक ताल पर थपकी दे रही हों। शोर फिर शुरू हो गया और इसी शोर में अवनी को सुनाई दिया।
“अवनी… समय हो गया है।”
अवनी ने चिल्लाने की कोशिश की, लेकिन आवाज़ उसके गले में घुट गई। परछाई उस पर झपटी और कमरे का हर कोना काली परछाइयों और फुसफुसाती आत्माओं से भर गया। दीवारें मानो खुद जीवित हो गई हों, खिड़कियों से अजीब-सी लाल परछाइयाँ अंदर झाँक रही थीं।
पंखे की चरमराहट और बारिश की बूंदें अब कुचले हुए पत्तों की तरह चीख रही थीं, और फर्श पर फैलती परछाइयाँ उसके कदमों का पीछा कर रही थीं।
अगली सुबह, वह घर और वह गाँव फिर से शांति में था। कई दिन बीत गए, कोई भी जंगल के किनारे खाली घर में बनी नई और खोदी गई कब्र को नहीं देख पाया और ना ही किसने यह भी जानने की कोशिश नहीं की वहां इतनी ख़ामोशी और सन्नाटा क्यों है और वह लड़की जो कभी वहाँ रहने आयी थी नज़र क्यों नहीं आ रही या शायद उन्हें पहले से पता था की वहाँ क्या होने वाला है।
आज भी अगर कोई वहाँ से गुज़रे और ध्यान से सुनें तो—बड़े बरगद के पेड़, मंदिर की घंटियाँ और झाड़ियों के बीच— हल्की, भूतिया, हिचकिचाती फुसफुसाहटें सुनाई देती है...!!!
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