लखनऊ की गलियाँ इतिहास से भरी पड़ी हैं। इमारतें, मकबरे, हवेलियाँ—सब बीते समय के साक्षी हैं, लखनऊ की इन्हीं तंग पुरानी गलियों में, एक ऐसी हवेली खड़ी थी जिसके नाम से ही लोग कांप उठते थे। चार मंज़िला इमारत, ऊँची-ऊँची दीवारें, टूटे झरोखे, काई जमी ईंटें और टूटी खिड़कियों वाली। बाहर की दीवारों पर चूना झड़ चुका था, जैसे हवेली अपनी ही परतें उखाड़कर अंदर का अंधेरा दिखाना चाहती हो।
दिन में देखने वालों को भी यह जगह डराती थी, और रात में तो कोई इधर से गुजरना तक नहीं चाहता था। लोग कहते थे कि वहाँ से अक्सर पायल की छनक और किसी औरत के धीमे गीत की आवाज़ आती है।
हवेली के ठीक सामने एक पीपल का पेड़ था, जिसकी जड़ों ने ज़मीन को फाड़ दिया था। रात होते ही उस पेड़ की डालियों पर चमगादड़ लटक जाते और उनकी चीख़ें हवेली से निकलती सरसराहट में मिलकर एक अजीब सी धुन बना देतीं। लोग कहते थे, यह हवेली "शर्मा हवेली" कहलाती थी। करीब सौ साल पहले यहां ठाकुर रामनारायण शर्मा अपने परिवार के साथ रहते थे। पैसे की कोई कमी न थी। लेकिन जिस रात उनकी बेटी की शादी थी, उसी रात दुल्हन समेत पूरा परिवार अचानक ग़ायब हो गया।
पड़ोसियों ने कहा कि वे लोग हवेली के अंदर ही मरे थे। कुछ ने कहा कि दुल्हन ने आत्महत्या की थी। किसी ने यह भी कहा कि ठाकुर की हवेली पर किसी औरत का श्राप था। उस रात के बाद से हवेली वीरान हो गई। हर साल कोई न कोई औरत उस हवेली के सामने मर जाती — कभी गला घुटने से, कभी छत से कूदकर, कभी अचानक दिल थम जाने से।
लोगों ने मान लिया कि हवेली औरतों की आत्मा खा जाती है।
लेकिन वक्त बदल गया। अब शहर की भीड़ बढ़ रही थी, पर हवेली वैसी ही खड़ी थी — खामोश, टूटी-फूटी, मगर जिंदा। इसी हवेली की वजह से एक कहानी जन्मी, जिसने इंसानों को मौत, दहशत और रहस्य की गिरफ्त में ले लिया।
तस्वीर का रहस्य
राकेश एक साधारण क्लर्क था, लेकिन उसका असली जुनून फ़ोटोग्राफ़ी था। ऑफिस में उसकी पहचान सिर्फ़ काम करने वाले के रूप में नहीं थी; हर कोई जानता था कि वह कैमरे के पीछे कमाल का जादू कर सकता है। किसी की भी फोटो खींचनी हो, चाहे वह मालिक हो या चपरासी, राकेश हमेशा तैयार रहता।
एक दिन उसके सहकर्मी सुरेश ने उससे कहा—
“राकेश, एक काम करना है, मेरी पत्नी और भाभी की फोटो खींचनी है,” सुरेश ने कहा, “एकदम अच्छे कैमरे से, ताकि वो यादगार बनी रहे।”राकेश ने तुरंत हामी भर दी। यह कोई मुश्किल काम नहीं था। उसने तय किया कि रविवार को तस्वीर खींची जाएगी, हवेली जैसी पुरानी जगह पर, जहां रोशनी और माहौल फोटो के लिए परफ़ेक्ट था।
रविवार सुबह, राकेश कैमरा लेकर हवेली पहुँचा। हवेली का माहौल ही कुछ अलग था। टूटी-फूटी खिड़कियों से छनती धूप कमरे में विचित्र छायाएँ बना रही थी। धूल और मकड़ी के जाले हर जगह फैले थे। हवेली के पुराने फर्श पर कदम रखते ही अजीब ठंडी हवा ने उसे घेर लिया, जैसे किसी ने कहा हो—“यहाँ मत रहो।”
सुरेश की पत्नी और भाभी को दो बेंत की कुर्सियों पर बैठाया गया। राकेश ने फोकस करने में समय लिया। वह चाहता था कि तस्वीर परफेक्ट हो।
लेकिन जब शटर दबा, तो हवा अचानक तेज़ हो गई। पर्दे फड़फड़ाए, और खिड़कियों से छनकर हल्की रोशनी के बीच कमरे की दीवारें अजीब ढंग से हिलने लगीं। राकेश ने इसे हवेली की पुरानी संरचना का असर समझा और अनदेखा किया।
सोमवार सुबह, राकेश दफ़्तर आया और तस्वीर दिखाने लगा। उसकी आँखों में थकान और चेहरे पर चिंता साफ़ झलक रही थी।
सुरेश ने मज़ाक में पूछा –
“तो, फ़ोटोग्राफ़र साहब! तस्वीर कैसी आई?”
राकेश ने तस्वीर मेरी तरफ़ बढ़ाते हुए कहा –
“देख लो… पर कुछ अजीब है इसमें।”
राकेश बोला, “मैंने सिर्फ़ दो औरतें बैठाई थीं। तीसरी वहाँ थी ही नहीं। पर तस्वीर में… वह… खुद आ गई।”
जब सुरेश ने फोटो देखी तो, उसका रंग उड़ गया। उसके हाथ काँपने लगे और आँखों में आँसू भर आए।
कुर्सियों पर दो औरतें तो थीं, पर उनके बीच खड़ी थी तीसरी औरत।
वह धुंधली नज़र आ रही थी, लाल बनारसी साड़ी पहने, गले में लंबा सोने का हार, कानों में झुमके, और हाथों में चूड़ियाँ। सबसे डरावनी बात ये थी कि उसके पीछे खिड़की की सलाखें उसके शरीर के आर-पार दिखाई दे रही थीं। चेहरा धुंधला था, पर आँखें चमक रही थीं—जीवित, ठंडी, खाली।
सुरेश ने करुणा भरी आवाज़ में कहा
“ये… ये मेरी पहली पत्नी सुप्रिया है। आठ साल पहले उसकी मौत हो गई थी। उसकी कभी फोटो खिंची नहीं गई। मरने से पहले बार-बार कहती थी कि उसकी तस्वीर उतार लो। और सच में, बच्चा पैदा करने के बाद उसकी मौत हो गई थी। यही वही गहने हैं जो फोटो में दिख रहे हैं…”
हम सब सन्न रह गए। उस दिन से तस्वीर श्रापित और हवेली और भी ज्यादा शापित हो गयी।
दहशत की शुरुवात
उस रात से उनकी ज़िंदगी कभी पहले जैसी नहीं रही।
जैसे-जैसे दिन बीतते गए, अजीब घटनाएँ शुरू हो गईं। तस्वीर देखने के बाद सुरेश बेचैन होकर सो नहीं पाया। तस्वीर सुरेश के पास थी। उसे सुरेश अपने अलमारी के भीतर रखकर भूल जाना चाहता था। लेकिन रात होते ही उसे अजीब सरसराहट सुनाई देती। जैसे कोई नाखून काँच पर रगड़ रहा हो। कभी खनक, कभी किसी के कदमों की धीमी आहट। शुरू में लगा वहम है। लेकिन फिर गहनों की खनक साफ़-साफ़ गूँजने लगी—जैसे कोई वही हार और झुमके पहनकर सुरेश के कमरे में घूम रहा हो।
सुरेश को बार-बार लग रहा था कि दीवार पर टंगी तस्वीर की कॉपी से कोई हल्की-सी सरसराहट निकल रही है।
पहला शिकार बना राकेश पहले तो वह इसे मजाक समझता था, पर जब अँधेरे कोनो के बंद दरवाज़े खुलते है तो आपके भयानक ख्वाब हक़ीक़त बन जाते है।
फिर एक रात, राकेश अकेला अपने कमरे में बैठा था। अचानक कमरे की लाइट झिलमिली और शटर जैसी आवाज़ आई। उसने पीछे देखा—कोई नहीं था। पर ठंडी हवा उसके गले को घेर रही थी। उसके पैरों के नीचे फ़र्श पर नंगे पैर के गीले निशान थे, जो खिड़की की तरफ़ जाते हुए गायब हो गए।
अगली सुबह, राकेश का शरीर कमरे में मिला। लोगों ने कहा, उसके गले पर ठंडी उँगलियों के निशान थे। उसका चेहरा नीला और फ़टा हुआ दिख रहा था, और फ़र्श पर खून के निशान बने हुए थे।
राकेश की मौत के दो दिन के बाद अमावस थी और वो रात ना जाने क्यों इतनी भयावक होते जा रही थी
उस रात सुरेश नींद से हड़बड़ा कर उठा। अलमारी अपने आप खुली हुई थी। तस्वीर बाहर फर्श पर पड़ी थी। और उसमें… तीसरी औरत फिर दिखाई दे रही थी। पर इस बार उसका चेहरा धुँधला नहीं था। आँखें बिल्कुल खाली, काले गड्ढों जैसी… और होंठ खुले हुए, जैसे कोई बिन आवाज़ चीख रहा हो।
सुरेश तस्वीर उठाने ही वाला था कि पूरे कमरे में ठंडी हवा का झोंका चला। पर्दे फड़फड़ाने लगे, और एक औरत की परछाईं दीवार पर उभर आई। वही साड़ी, वही हार, वही अँगूठी। उसने धीरे-धीरे अलमारी की तरफ़ कदम बढ़ाए। उसके कदम फ़र्श को छूते भी नहीं थे, फिर भी **टप… टप…** की आवाज़ गूँज रही थी।
सुरेश डर से जड़ हो गया। वह पास आई, और उसके गहनों की खनक सुरेश के कानो फाड़ देने लगी। उसकी साँस की ठंडक सुरेश के चेहरे से टकराई। फिर… उसने तस्वीर में से हाथ बाहर निकाला। बिल्कुल असली हाथ, बर्फ़ जैसा ठंडा और हड्डियों-सा पतला। उसने सुरेश गले को छूने की कोशिश की।
सुरेश घबराकर पीछे हट गया। तभी कमरे की बत्ती झपक कर बुझ गई। अंधेरे में सुरेश सिर्फ़ उसकी आँखों की काली गहराई देख पा रहा था। वह फुसफुसाई—
“तस्वीर अधूरी है… तस्वीर अधूरी है…”
उसके बाद सुरेश कई दिनों तक बीमार रहा। मगर बात यहीं खत्म नहीं हुई।
अगली शिकार बनी सुरेश की पत्नी नेहा। हर रात वह अजीब बर्ताव करने लगी। वह कहती, “कोई मुझे पुकार रहा है… मुझे तस्वीर पूरी करनी है।” उसका चेहरा पीला पड़ गया, आँखें धँस गईं।
एक रात उसने खुद को कमरे में बंद कर लिया। जब दरवाज़ा तोड़ा गया, तो नेहा दीवार से चिपकी मिली। उसके गले पर गहरे लाल निशान थे। दीवार पर खून से लिखा था—
“अब तस्वीर पूरी हुई।”
यह देख कर हम सब डर के मारे काँप उठे। हवेली का श्राप अब केवल तस्वीर तक सीमित नहीं था।
सुप्रिया की आत्मा अब मुक्त हो चुकी थी।
अरविंद, हवेली का पड़ोसी, जो शुरू में सबकुछ मजाक समझता था, उसने आख़िरी बार अपनी तस्वीर खींची। जब तस्वीर डेवेलोप हुई, तो उसके पीछे सुप्रिया खड़ी थी। हाथ उसके कंधे पर। अगले दिन से अरविंद ग़ायब हो गया।
लोग कहते हैं, उसकी चीख़ अब भी हवेली की अँधेरी दीवारों में गूँजती है।
अब हवेली खुली थी। सुप्रिया की आत्मा सलाखों की कैदी नहीं रही। लखनऊ की गलियों में देर रात पायल की छनक सुनाई देती। खिड़कियों से झाँकती उसकी छाया लोगों को डराती। जिन्हें उसने छू लिया, वे हमेशा के लिए गायब हो गए।
तस्वीर का श्राप
सालों बीत गए। राकेश, नेहा और अरविंद की मौतों की कहानियाँ शहर में धुंधली हो चुकी थीं। लोग हवेली से दूर रहने लगे। लेकिन हवेली की दीवारों पर पायल की छनक और रात की फुसफुसाहट अब भी जीवित थी।
इसी बीच, लखनऊ यूनिवर्सिटी का छात्र अभिषेक अपनी फोटोग्राफी प्रोजेक्ट के लिए “Haunted Places of Lucknow” की खोज में निकला। उसके उद्देश्य थे—पुरानी हवेलियों की तस्वीरें लेना और इतिहास को कैमरे में कैद करना।
अभिषेक ने तय किया कि वह शर्मा हवेली में रात बिताएगा। उसने अपना DSLR, ट्राइपॉड और लैपटॉप सब साथ लिया। हवेली पहुँचते ही माहौल ने उसके रोम-रोम को ठंडा कर दिया। टूटी खिड़कियों से आती हवा, दीवारों पर बिखरी धूल, मकड़ी के जाले और चारों तरफ़ फैली अंधेरी छायाएँ। हर कदम पर ऐसा लग रहा था कि कोई उसे देख रहा है।
अभिषेक ने फोटो खींचना शुरू किया। टूटी-फूटी कुर्सियों के पास, दीवारों के झरोखों और पुरानी झूलती झाड़ियाँ। उसने तस्वीरें खींचते हुए धीरे-धीरे हवेली के सबसे बड़े कमरे में प्रवेश किया। वहाँ, ठीक उसी जगह पर जहाँ राकेश ने पहली बार फोटो खींची थी, दो कुर्सियाँ रखी थीं।
उसने कैमरा सेट किया, शटर दबाया और फ़्रेम में देखा। एक पल के लिए सब सामान्य था। लेकिन जब उसने फोटो स्क्रीन पर देखा, तो उसके दिल की धड़कन रुक गई।
तीसरी औरत — सुप्रिया — खड़ी थी। लाल साड़ी, चमकते गहने, धुंधला चेहरा, और आँखे सीधे अभिषेक को घूर रही थीं। वह पूरी तरह पारदर्शी नहीं थी। उसकी मौजूदगी इतनी स्पष्ट थी कि कमरे की हवादार खामोशी में उसका अस्तित्व महसूस हो रहा था।
अभिषेक ने कैमरे का लेंस साफ़ किया। लाइव व्यू मोड में देखा — और उसकी रूह कंपकंपा उठी। पीछे, बिल्कुल उसके पास, वही औरत खड़ी थी। पायल की छनक धीमे-धीमे कमरे में गूँज रही थी। हवा ठंडी हो गई, उसके बाल उड़ने लगे।
वह चीख़ना चाहा, पर आवाज़ नहीं निकली। हाथ बढ़ाया — पर सामने खाली जगह थी। कैमरे की स्क्रीन में उसने देखा, हाथ उसके गले पर रखे हुए हैं।
सुबह तक हॉस्टल का कमरा खाली मिला। अभिषेक कहीं नहीं था। दो दिनों तक अभिषेक के तलाश यूनिवर्सिटी वालों ने की और यह केस पुलिस को सौंप दिया गया जब पुलिस इंस्पेक्टर ने उसके कैमरे की तस्वीर देखी तो, उसकी तस्वीर कैमरे में मिली। उसमें अभिषेक के गले पर सुप्रिया के ठंडे हाथ थे। और कैमरे के नीचे खून से लिखा था—
“अब तस्वीर पूरी हो चुकी है।”
इन सारी बुरे हादसे और मौतों के बाद सुरेश और उसकी भाभी वहां से चले गए , वह कहाँ गए किसी को भी नहीं पता।
अब हवेली और तस्वीर का श्राप स्पष्ट था। हर नया शिकार, हर नया कैमरा, हर नया व्यक्ति सुप्रिया की “अधूरी तस्वीर” का हिस्सा बन जाता। उसकी आत्मा अब किसी के भी डर का, किसी के भी जीवन का हिस्सा बन चुकी थी।
कहते हैं, अगर कोई आज भी उस हवेली में कैमरा लेकर जाता है, तो तस्वीर के कोने में वही मुस्कान झलकती है। अधूरी, ठंडी और भयानक।
धीरे-धीरे कानों में फुसफुसाहट आती है—
क्या यह मुमकिन है की सुप्रिया जिसको मरे आठ साल हो चुके थे क्या सिर्फ एक तस्वीर से मीडियम से इस दुनिया में वापस आ सकती है..? या फिर उस तस्वीर ने किसी और के लिए उस दुनिया से इस दुनिया के बीच दरवाज़ खोल दिया था जिसने सुप्रिया का रूप लिया.....!! और सबसे बड़ा सवाल यह है की उस औरत ने सुरेश और उसकी भाभी की क्यों नहीं मारा, आज भी ये कहानी कई सवालों के घेरे में है जिसका जवाब किसी के पास नहीं है।
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