राजस्थान के झुंझुनू ज़िले में एक सौ साल पुरानी हवेली थी— सिसु हवेली। कभी इसमें शान-ओ-शौकत थी, मेहमानों का तांता लगा रहता था, महफ़िलें सजती थीं। लेकिन अब वह सुनसान और वीरान खड़ी थी, जैसे अपने ही रहस्यों को निगल चुकी हो। गाँववाले कहते थे, हवेली सिर्फ़ जर्जर नहीं हुई थी—वह जाग गई थी।
रात के अंधेरे में जब हवेली की टूटी खिड़कियों से हवा गुजरती, तो लगता मानो कोई औरत धीमे स्वर में लोरी गा रही हो। कई बार भीतर से पायल की झंकार सुनाई देती, जबकि वहाँ कोई नहीं होता। बंद दरवाज़े अपने-आप खुल जाते, और गलियारों में सरसराहट गूँजती, जैसे कोई अदृश्य क़दमों से चल रहा हो।
लेकिन सबसे भयानक बात यह थी कि हवेली की ऊपरी मंज़िल पर एक टूटा हुआ आईना रखा था। गाँव के लोग मानते थे कि उसमें देखने वाला अपनी परछाई नहीं, बल्कि अपने ही मरने का मंज़र देखता है। कुछ का दावा था कि उन्होंने आईने में जलते हुए चिता की लपटें देखी थीं, और अपने ही चेहरे को राख में बदलते हुए।
कभी-कभी, हवेली की खामोशी अचानक बदल जाती। दीवारों पर पड़े पुराने चित्रों की आँखें चमक उठतीं, मानो वे जीवित हों। और आधी रात को हवेली के आँगन में पड़ा सूखा पीपल का पेड़ अपने आप हिलता, उसकी टहनियाँ किसी इंसान की हड्डियों जैसी चरमराहट करतीं।
इस हवेली के पास से गुज़रना भी लोग टालते थे। कहते हैं, अगर किसी ने हवेली के भीतर आधी रात बिताई… तो सुबह तक उसकी परछाई कभी सूरज की रोशनी में नज़र नहीं आती।
रहस्मयी पेंटिंग
इसी हवेली में एक दिन एक नीलामी रखी गई। सदियों से जमी धूल और जाले हटाकर पुराने सामान, पेंटिंग्स और फर्नीचर लोगों के सामने लाए गए। भारी झूमर आधा टूटा लटका था, और उसके नीचे लगे पीतल के दीये अचानक बिना तेल के टिमटिमाने लगते। बाहर खड़ा सूखा पीपल का पेड़ हवा के बिना भी सरसराता, मानो किसी अनजानी आहट का जवाब दे रहा हो।
नीलामी देखने आई थी अनुष्का वर्मा, दिल्ली की मशहूर आर्ट कलेक्टर। अजीब, दुर्लभ और रहस्यमयी चीज़ें इकट्ठा करना उसका जुनून था। उसे पुराने सामानों में सिर्फ़ कला नहीं, बल्कि उनमें छिपी कहानियाँ और रहस्य खींचते थे।
उनसे कैटलॉग देखा कैटलॉग में कई चीज़ें थीं—जंग लगी तलवारें, रजवाड़ों के सोने-चाँदी के गहने, और खंडित मूर्तियाँ, जिनकी आँखें अजीब तरह से अनुष्का को घूरती हुई लग रही थीं। नीलामी शुरू हुई, लोग दाम लगाते रहे, लेकिन उसी दौरान अनुष्का की नज़र ठिठक गई।
गैलरी के सबसे अंधेरे कोने में, आधे परदे से ढकी एक पेंटिंग रखी थी। उसके चारों ओर अजीब सन्नाटा था, जैसे कमरे की सारी फुसफुसाहट वहीं आकर थम गई हो। बाकी सामान के बीच वह पेंटिंग अलग ही आभा बिखेर रही थी—न कोई नाम, न तारीख़, न किसी कैटलॉग में उसका ज़िक्र।
लेकिन सबसे विचित्र बात यह थी कि पेंटिंग के पास रखा लकड़ी का फ्रेम हल्का-सा हिल रहा था, जबकि वहाँ हवा का एक झोंका तक नहीं था। और जब अनुष्का ने ध्यान से देखा… तो उसे यक़ीन हुआ कि उस परदे के भीतर से किसी की आँखें उसे ताक रही थीं।
अनुष्का ने पेंटिंग को बड़े गौर से देखा
पेंटिंग में एक आदमी था—लंबा, हड्डियों का ढांचा-सा दुबला, खोखली और गहरी आँखों वाला। उसका चेहरा मोम की तरह जड़ा हुआ था, पर उस पर एक अजीब-सी चमक थी, जैसे किसी मृत शरीर पर चढ़ी चाँदनी। उसकी त्वचा पर महीन दरारें थीं, और उन दरारों से काली परछाइयाँ रिसती हुई-सी लगती थीं।
पीछे की पृष्ठभूमि में फैली थी वीरान मरुभूमि, जहाँ ज़मीन में अनगिनत उभरे हाथ जैसे दबे हुए लोगों की आत्माएँ बाहर निकलने की कोशिश कर रही हों। सूखे बबूल के पेड़ अपनी टेढ़ी-मेढ़ी शाखाओं से ऐसे फैल रहे थे मानो किसी इंसान को गला घोंटने को तैयार हों। आसमान में लटकता रक्त-लाल चाँद इतना पास लग रहा था कि उसकी परछाई से पूरा दृश्य किसी नरक की आग में डूबा दिखाई दे रहा था।
लेकिन सबसे भयावह थीं उसकी आँखें।
वे खोखली होकर भी इतनी जीवंत, इतनी असली और गहरी थीं कि लगता था मानो कैनवास से बाहर निकलकर सीधे अनुष्का को घूर रही हों। उनमें हल्की-सी हरकत थी—जैसे पुतलियाँ धीरे-धीरे उसकी तरफ घूम रही हों।
अनुष्का को ऐसा महसूस हुआ कि उन आँखों में केवल नज़र नहीं, बल्कि आवाज़ भी थी—एक धीमी फुसफुसाहट, जो उसके कानों तक नहीं, बल्कि सीधे उसके दिमाग़ में गूंज रही थी। और जब अनुष्का ने पलके झपकाई… उसे महसूस हुआ कि पेंटिंग में उस आदमी के होंठ हल्के से हिले थे, मानो कोई मंत्र बुदबुदा रहा हो।
अनुष्का ने नीलामीकर्ता से पूछा—
“ये कितने की है?”
नीलामीकर्ता ठिठक गया। उसके चेहरे पर अचानक एक अजीब-सी सिहरन दौड़ गई।
“मैडम… ये लिस्ट में नहीं है। पता नहीं कहाँ से आई। हवेली के तहख़ाने में पड़ी मिली थी। कहते हैं, यह ठाकुर साहब की आख़िरी पेंटिंग थी। लेकिन उसके बाद… जो भी इस हवेली में रहा, वो ज़्यादा दिन ज़िंदा नहीं रहा। कुछ तो बिना कारण गायब हो गए, और जो मिले… उनके चेहरे पहचान में नहीं आते थे।”
पास खड़े कुछ लोग बुदबुदाने लगे। एक बुज़ुर्ग औरत ने तो मुँह फेर लिया और बड़बड़ाते हुए सिर पर हाथ रख लिया, “उस तस्वीर में परछाई नहीं, आत्मा बंधी है।”
अनुष्का हँस पड़ी। और बोली “इन्ही तरह के कलाओं की मुझे हमेशा से तलाश रही है।”
उसकी आँखों में चमक थी, मानो डर से ज़्यादा रोमांच महसूस कर रही हो। उसने मोटी बोली लगाई और पेंटिंग खरीद ली।
लेकिन जैसे ही हथौड़ा बजा और सौदा पक्का हुआ, पेंटिंग के फ्रेम से धीमी खराश जैसी आवाज़ आई। नीलामी हॉल की खिड़की अचानक अपने-आप बंद हो गई, और झूमर ऐसे हिलने लगा मानो किसी अदृश्य हाथ ने उसे धक्का दिया हो।
नीलामीकर्ता ने अनुष्का की ओर देखा—उसकी आँखों में साफ़ डर था। “मैडम… आपने इसे खरीद लिया, लेकिन याद रखिए, कुछ चीज़ें खरीदी नहीं जातीं… वो ख़ुद ही मालिक चुनती हैं।”
दहशत की शुरुवात
दो दिन बाद, पेंटिंग उसके घर पहुँच गई।
वह उम्मीद से कहीं बड़ी थी—लगभग दरवाज़े जितनी ऊँची और चौड़ी। जब मज़दूरों ने उसे दीवार पर टाँगा, तो ऐसा लगा जैसे वह दीवार का हिस्सा न होकर खुद ही उस जगह की हक़दार हो। कमरे की बाकी तस्वीरें और सजावट अचानक बौनी लगने लगीं।
अनुष्का ने उसे घर के बैठकखाने में टांग दिया। पर अजीब बात यह थी कि पेंटिंग सजावट नहीं, बल्कि किसी मौजूदगी की तरह महसूस होती थी—मानो कमरे में कोई अनदेखा मेहमान खड़ा हो।
शुरुआती दिनों में उसने इसे नज़रअंदाज़ करने की कोशिश की। मगर हर बार जब वह उस कमरे से गुज़रती, उसकी आँखें पेंटिंग की आँखों से टकरा जातीं। वे आँखें न सिर्फ़ उसका पीछा करतीं, बल्कि कभी-कभी उनमें हल्की-सी चमक भी दिखती—जैसे किसी गहरे कुएँ में टिमटिमाती आख़िरी रोशनी।
धीरे-धीरे उसे यक़ीन होने लगा कि वे आँखें उसका पीछा करती हैं। कभी-कभी कमरे में अकेले बैठते हुए उसे ऐसा लगता मानो पेंटिंग के फ्रेम से धीमी साँसों की आवाज़ आ रही हो। और एक रात उसने साफ़ सुना—दीवार के अंदर से खट-खटाते नाख़ूनों जैसी आवाज़।
अनुष्का का पालतू कुत्ता भी उस कमरे में घुसने से मना करता, दरवाज़े पर आकर दुम दबाकर भौंकने लगता। और एक दिन अनुष्का ने महसूस किया कि पेंटिंग के नीचे बिछी कालीन पर हल्की-सी नमी थी—जैसे किसी ने वहाँ खून टपकाया हो, जो धीरे-धीरे कपड़े में समा गया।
एक रात उसने देखा—आँखें हल्की-सी हिली थीं। अब वे सीधे उस पर टिकी थीं। उसका दिल धक से रह गया, साँसें थम-सी गईं। जैसे किसी ने बर्फ़ का टुकड़ा उसकी रीढ़ में रख दिया हो। वह डर के मारे पीछे हट गई, लेकिन जितना पीछे जाती, उतना ही लगता कि वो आँखें और पास आ रही हैं।
दिन बीतते गए और बदलाव और साफ़ दिखने लगे। पेंटिंग का आसमान और गहरा, स्याह काला हो गया—मानो उसमें रोशनी को निगल जाने की शक्ति हो। पेड़ों की शाखाएँ पंजों जैसी लगने लगीं, और कभी-कभी उन शाखाओं से खून की बूँदें टपकती दिखाई देतीं, जो कैनवास के बाहर तक बहने लगतीं और फिर अचानक ग़ायब हो जातीं।
उस आदमी के होंठों पर पतली, शैतानी मुस्कान अब और चौड़ी होती जा रही थी। कभी-कभी लगता उसके पीले दाँत उस मुस्कान के भीतर झलक रहे हों, और होंठ हल्के-हल्के हिल रहे हों, जैसे किसी अदृश्य भाषा में प्रार्थना या शाप बुदबुदा रहे हों।
अनुष्का अब बैठकखाने से कतराने लगी। मगर चाहकर भी वह पेंटिंग की मौजूदगी को भूल नहीं पाती। हवेली के हर कोने में उसे लगता कि कोई उसे देख रहा है—कभी आईने में पीछे खड़ा साया, कभी सीढ़ियों पर किसी का दबा हुआ क़दम, तो कभी दरवाज़े की दरार से झाँकती दो जली हुई आँखें।
सबसे डरावना तो तब हुआ, जब एक रात वह कमरे से बाहर निकली और पीछे से पेंटिंग की सतह पर किसी के नाख़ून घिसटने की आवाज़ आई—और दीवार पर लंबे-लंबे खरोंच के निशान छोड़ गई, जो सुबह तक मिटते नहीं थे।
सातवीं रात
आधी रात को अनुष्का को फुसफुसाहटें सुनाई दीं। आवाज़ें नीचे बैठक से आ रही थीं, मगर शब्द नहीं, केवल धीमे-धीमे बुदबुदाने जैसी आवाज़ें—जैसे कोई मृत आत्माएँ अपनी कहानियाँ सुना रही हों। कभी-कभी वह फुसफुसाहट इतनी तेज़ हो जाती कि दीवारें कांपती हुई लगतीं।
वह डरते-डरते सीढ़ियों से उतरी। हर कदम पर लकड़ी के फर्श से क़दमों की छाया जैसे उसके पीछे चल रही थी, पर जब वह मुड़ी तो वहाँ कुछ भी नज़र नहीं आया।
बैठकखाने में पेंटिंग हल्की-सी नीली-लाल चमक के साथ झिलमिला रही थी। हवा ठंडी और भारी हो गई, और अचानक कमरे में कच्ची मिट्टी और सड़े पत्तों की बदबू भर गई।
और उसमें बना आदमी… अब हिल रहा था। उसकी आँखें इधर-उधर घूम रही थीं, हाथ काँप रहे थे, और चेहरे पर चौड़ी, डरावनी मुस्कान थी। उसकी आँखों में हल्की धुंधली लाल चमक थी, मानो अंदर कोई आग जल रही हो।
पेंटिंग के पीछे का रक्त-लाल चाँद अब और बड़ा और चमकदार दिख रहा था, जैसे वह कमरे में उतर आया हो। छाया की लहरें कमरे की दीवारों पर फैल रही थीं, और कभी-कभी लगता मानो पेंटिंग से कोई साँसों की गंध—जिंदा और सड़ी हुई—आ रही हो।
अनुष्का का गला सूख गया। वह चिल्लाना चाहती थी, मगर आवाज़ गले में अटक गई। उसने महसूस किया—अब वह आदमी सिर्फ देख नहीं रहा था, बल्कि उसकी रूह तक को भेद रहा था।
एक खिंचाव उसके सीने में उठा, मानो कोई अदृश्य ताक़त उसे कैनवास की तरफ खींच रही हो। उसका शरीर ठंडा और भारी हो गया, बाल खड़े हो गए। बड़ी मुश्किल से उसने अपनी नज़र तोड़ी और भागकर दरवाज़ा बंद कर दिया।
लेकिन फुसफुसाहटें रुकने का नाम ही नहीं ले रही थीं। अब वे कमरे में गूँजती थीं, दीवारों से टकराकर तेज़ हो रही थीं, और कभी-कभी ऐसा लगता मानो किसी की हँसी उसके सिर में घुस रही हो।
अगले दिन उसने लोगों को बुलाया ताकि पेंटिंग को हटवाया जा सके। मगर चाहे जितनी भी कोशिश की गई, पेंटिंग दीवार से टस से मस नहीं हुई। जैसे वह अब दीवार की आत्मा बन गई हो। हर हथियार, रस्सी या औज़ार जो उसे हिलाने की कोशिश करता, वे सब कड़कने या टूटने लगते। कमरे की हवा ठंडी और गहरी हो गई, और दीवारों पर हल्की-हल्की खराश जैसी आवाज़ें सुनाई देतीं, जैसे पेंटिंग खुद से धीरे-धीरे हिल रही हो।
इसके बाद से अनुष्का की हालत तेजी से बिगड़ने लगी। उसका चेहरा पीला पड़ गया, आँखों के नीचे गहरे काले घेरे उभर आए, और त्वचा इतनी पतली हो गई कि नसों की नीली रेखाएँ साफ़ नज़र आने लगीं। उसके बालों में सफ़ेदी तेजी से फैलने लगी, और कभी-कभी वह कमरे में अकेली होते हुए महसूस करती कि किसी की सर्द साँस उसके गले पर टिकी है।
उधर, पेंटिंग का आदमी और जीवंत होता जा रहा था। उसकी आँखों में अब भयानक चमक थी, होंठों पर पूरी मुस्कान और कभी-कभी हल्की-सी हँसी सुनाई देती—जो कमरे के चारों ओर गूँजती और दीवारों से टकराकर बढ़ जाती।
और फिर एक रात, अनुष्का पेंटिंग के सामने रुक गई। खुद-ब-खुद। बहुत देर तक।
उसने महसूस किया कि उसकी आत्मा धीरे-धीरे कैनवास की ओर खिंच रही है। शरीर ठंडा, भारी और जकड़ा हुआ महसूस हुआ। उसके पैर जैसे जमीन से अलग हो रहे हों। उसने आँखें फेरने की कोशिश की, मगर अब बहुत देर हो चुकी थी।
आख़िरी बार उसने वही आँखें देखीं—भयानक संतुष्टि से चमकती हुई, जैसे वह जान चुका हो कि अब वह उसकी पूरी आत्मा पर कब्ज़ा कर चुका है।
और फिर… सब अंधेरा।
कमरे में केवल धीमी, मृत आत्माओं की फुसफुसाहटें गूँज रही थीं, जो धीरे-धीरे उसकी चेतना में समा गई थीं। पेंटिंग अब सिर्फ़ दीवार पर नहीं थी—वह जीवित हो गई थी।
अंतिम पड़ाव
कुछ दिनों बाद जब रिश्तेदार घर में पहुँचे, तो अनुष्का कहीं नहीं मिली। घर बिल्कुल वैसा ही था—दरवाज़े बंद, खिड़कियाँ सलामत, मगर हवा में एक अजीब-सी बासी गंध थी, जैसे कोई अंदर ही अंदर सड़ चुका हो।
बस बैठकखाने में वही पेंटिंग टंगी थी।
लेकिन अब वह अलग लग रही थी। आदमी के बगल में एक और चेहरा उभर आया था—एक औरत का चेहरा। पीला, हड्डियों से चिपकी त्वचा, आँखों में स्थायी डर और मुँह मौन चीख में खुला, मानो आख़िरी साँस को वहीं जकड़ लिया गया हो।
धीरे-धीरे देखा गया कि उस औरत का चेहरा अनुष्का से मिलता-जुलता था। कोई रिश्तेदार हिम्मत कर पास गया तो उसने महसूस किया कि पेंटिंग से हल्की-हल्की फुसफुसाहटें आ रही थीं—अनुष्का की आवाज़ जैसी, धीमी, टूटी-फूटी… जैसे मदद की गुहार हो।
औरत का चेहरा वहाँ स्थायी रूप से कैद था। आँखें पेंटिंग से बाहर झाँकतीं, किसी भी देखने वाले से टकरातीं और उसके दिल की धड़कनें रोक देतीं।
अनुष्का वर्मा अब उस पेंटिंग का हिस्सा बन चुकी थी।
हमेशा के लिए।
हमेशा कैद।
हमेशा देखी जाने वाली—और देखने वालों को धीरे-धीरे अपनी ओर खींचने वाली।
अगर आपको यह कहानी डरावनी लगी, तो नीचे कमेंट में बताइए और हमारे साथ और भूतिया कहानियों की दुनिया में खो जाइए। नई कहानियों के लिए हमें फॉलो करें Bhoot Kahani और हर हफ्ते डर के नए किस्सों का आनंद लें..!!


0 टिप्पणियाँ