ख़ामोशी


अमिता एक इनवेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट थी, जो अजीब और असाधारण घटनाओं में गहरे घुसने के लिए जानी जाती थी। उसे हमेशा ऐसे रहस्यों की तलाश रहती थी, जो आम लोगों की समझ से बाहर होते। पिछले कुछ हफ्तों में, उसे एक गुमनाम टिप मिली थी, जो एक दूरदराज के गाँव के बारे में थी—इतना दूर कि यह किसी भी मैप पर मुश्किल से नजर आता था। टिप में एक रहस्यमय संदेश था: “आओ, उस गाँव को देखो, जहाँ सन्नाटा राज करता है। जानो, क्यों यहाँ कोई बात नहीं करता।”

गाँव की तलाश

अमिता ने अपनी कार निकली और चल पड़ी उस गाँव की ओर उसने एक टर्न लिया जैसे मैप में दिखाया गया था और अब वह उस गाँव की सड़क पर अपनी कार चला रही थी जो पहले सी ही मनहूसियत से भरा पड़ा था। 

जैसे-जैसे वह गाँव के करीब पहुँच रही थी, एक अजीब सी खामोशी ने उसे घेर लिया। यह सिर्फ इंसानी आवाज़ों की कमी नहीं थी, बल्कि यहाँ की हवा भी जैसे किसी डरावने शाप के नीचे जकड़ी हुई हो। न तो हवा ने पेड़ों को झकझोरा, न ही पक्षियों ने किसी कोलाहल में आवाज़ दी। ऐसा लग रहा था जैसे पूरी कुदरत ने खुद को म्यूट कर लिया हो, और यह गाँव अलग ही दुनिया की तरह उबकाई में डूबा हुआ हो।

उसने कार की खिड़की से बाहर झाँकते हुए, देखा, गाँव के पास की छोटी सी झील का पानी भी जड़ जैसा ठहरा हुआ था, बिना एक भी लहर के। ऐसा लग रहा था जैसे समय खुद भी यहाँ थम गया हो। हवा में गहरी चुप्पी थी, और कोई अजीब सा भय उसके अंदर समा रहा था, जैसे यहाँ कुछ बहुत पुराना और खौ़फनाक दबा हुआ हो, जिसे जगाने की कोई कोशिश कर रहा हो।

तभी अचानक अमिता की कार के पहिए सड़क पर पड़ी बजरी और कंकड़ पर रगड़ते हुए एक डरावनी आवाज़ करते हुए गाँव के एंट्रेंस पर पहुँचे। हर रगड़ के साथ ऐसा महसूस हो रहा था जैसे कार की आवाज़ उस गहरे सन्नाटे को और भी बढ़ा रही हो, जैसे हवा तक काँप रही हो। अचानक, उसकी हेडलाइट्स एक पल के लिए बुझ गईं, और उसके दिल में एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई, जैसे अंधेरे में कुछ घातक और बुरा मौजूद हो, जो उसकी साँसों को खींच रहा हो। उसके दिल की धड़कनें तेज़ हो गईं, और एक ठंडी हवा ने उसके चेहरे को छुआ, जैसे किसी ने अचानक पास से गुजरते हुए उसे छुआ हो, लेकिन जब उसने अपनी आँखें घुमाई, तो कुछ भी नहीं था। 

एक हल्की सी घबराहट ने उसे घेर लिया, लेकिन फिर हेडलाइट्स खुद-ब-खुद जल गईं, जैसे कुछ क्षण के लिए उसे डराने के लिए ही बुझी थीं। सूरज अब पूरी तरह डूब चुका था, और आकाश गहरे बैंगनी और रक्त रंजित लाल रंग में रंगा हुआ था, जैसे पूरी दुनिया खून के आँसू रो रही हो। ऐसा लग रहा था जैसे खुद आकाश भी यह राज़ जानता हो, के उस सुनसान गाँव में क्या छिपा हुआ था, और अब वह समय आ गया था जब वह राज़ बाहर आएगा। अमिता कार के डैशबोर्ड पर GPS को देखा, जो "सिग्नल नहीं" दिखा रहा था। जैसे की हर बार, जब भी उसे सबसे ज़्यादा जरूरत होती, टेक्नोलॉजी उसका साथ छोड़ देती थी, जैसे कोई अज्ञात शक्ति उसे चेतावनी दे रही हो।

उसने डरते हुए कार की खिड़की से बाहर झाँका, और एक अजीब सा एहसास हुआ कि उसपर किसी ने निगरानी रखी हुई है। उसका मन जैसे एक अजीब सी बेचैनी से भर गया, लेकिन कोई था जो उसकी आँखों से छुपा था, शायद हवा, शायद अंधेरा, जो उसकी ही परछाईं को निगल रहा था। वह महसूस कर सकती थी, जैसे उसके आसपास का वातावरण खुद में कोई गहरी, कुछ भयानक चीज़ को समेटे हुए हो, जो मौका देख कर उसे निगलने के लिए तैयार हो।

वह कार से नीचे उतरी और धीरे-धीरे गाँव के किनारे से निकलने वाली उस सुनसान और वीरान सड़क पर अपनी नजरें घुमा रही थी, और उसके दिल में एक घबराहट सी महसूस होने लगी, जैसे कोई बहुत पास खड़ा हो, उसे देख रहा हो, लेकिन फिर भी उसका आभास न हो। वह सुन सकती थी, जैसे कोई उसके ठीक पीछे खड़ा हो, उसकी साँसों की आवाज़ कानों में गूंज रही हो, लेकिन जब उसने पलट कर देखा, तो वहाँ कोई नहीं था—केवल वही पुरानी, खामोश सड़क, जो खुद में एक रहस्य समेटे हुए थी।

यह रात का अँधेरा यह ख़ामोशी और यह डर, लेकिन अब यह सब मायने नहीं रखता था। उसे एक ऐसी कहानी ढूँढनी थी, जो उसकी पूरी ज़िंदगी बदल सकती थी, या शायद, उसकी ज़िंदगी खत्म कर सकती थी।

खामोश गाँव

वह कार से बाहर निकली, अपने कोट को कसकर लपेटते हुए, चल पड़ी वह गाँव के अन्दर..!!

जैसे ही वह गाँव में घुसी, उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा। सन्नाटा और भी गहरा हो गया था, जैसे हर कदम के साथ गाँव की जमीं उसके पैरों तले और भी भारी होती जा रही हो। हर घर जैसे एक घने बादल से ढका हुआ था, और उनके भीतर से एक ठंडी हवा आ रही थी, जो उसकी त्वचा को सिहरन से भर देती थी। कहीं से किसी के हँसने की खौ़फनाक आवाज़ आई, लेकिन जब वह मुड़ी, तो चारों ओर कोई नहीं था। सिर्फ अंधेरा और चुप्पी थी, जैसे कोई छिपा हुआ साया उसकी आँखों के सामने से रेंगता हो, लेकिन उसकी छाया का कोई रूप न हो।

वह गाँव के केंद्र में पहुँची, जहाँ एक खंडहर जैसा पुराना कुआँ था। इसके आसपास किसी ने खून से सने पुराने कपड़े और कुछ टूटी हुई मूर्तियाँ फेंक रखी थीं, जैसे यहाँ कोई बुरी शक्ति बैठी हो। एक अजीब सी गंध आई, जैसे सड़न और मृत देह की दुर्गंध हवा में फैल गई हो। उसकी नजरें घुमाई, और उस छोटे से रास्ते पर उसे एक बर्फ जैसी सर्दी महसूस हुई, जैसे हवा में कुछ था, कुछ जो साँसें रोक रहा हो।

तभी, उसके कानों में हल्की सी, बेहद धीमी चीख सुनाई दी, जैसे किसी की मदद के लिए पुकार हो। वह चौंकी, लेकिन जब उसने इधर-उधर देखा, तो कुछ भी नहीं था। उसकी धड़कनें अब कानों में गूंज रही थीं। एक अनकही दहशत उसके भीतर समाती जा रही थी। वह किसी नकारात्मक शक्ति से घिरी हुई थी, लेकिन उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह शक्ति कहाँ से आ रही थी। क्या यह बस उसका भ्रम था, या सचमुच कुछ गहरा और डरावना था, जो यहाँ बसा हुआ था?

गाँव की घनी चुप्पी अब उसे और भी असहज महसूस करवा रही थी। जैसे कुछ छुपा हुआ हो, कुछ जो बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। हवा में घुली गहरी खामोशी उसके अंदर डर और जिज्ञासा को और बढ़ा रही थी। और तभी उसे महसूस हुआ, जैसे गाँव के घरों की खिड़कियाँ उसके ऊपर घूर रही हों—न देखे हुए, लेकिन अवश्य देखी जा रही। जैसे ही वह एक छोटी सी सराय की ओर बढ़ी, उसने अपनी आँखों के कोने से कुछ देखा—पास की खिड़कियों में अस्पष्ट साए घूमें। एक छाया,उसे देख रही हो।

तभी एक दरवाजा चरमरा कर खुला, और एक औरत बाहर आई। वह आधी उम्र की थी, लेकिन उसका चेहरा इतना सूखा और पीला था, जैसे किसी भूतिया रात के बाद उसका रंग पूरी तरह खो चुका हो। उसकी आँखें घबराहट और भय से भरी हुई थीं, जैसे किसी ने उसे बहुत लंबे समय तक डराया हो, और अब वह किसी भयावह हकीकत से जूझ रही हो। उसकी त्वचा एकदम पतली और झुर्रियों से ढकी हुई थी, जैसे किसी पुराने शव का हिस्सा हो। उसकी आँखों में एक गहरी नीरवता थी, लेकिन फिर भी उसमें एक अजीब सी बेचैनी और घबराहट थी, जैसे उसके भीतर कोई अज्ञात शक्ति जाग रही हो। उसकी धड़कनें जैसे उसके गले में गूँज रही थीं।

उस औरत ने अमिता को घूरते हुए धीरे से अपना हाथ उठाया, और उसके हाथ की उंगलियाँ उस हवा में कांपने लगीं, जैसे वह कोई खौ़फनाक अनुष्ठान कर रही हो। अमिता की आँखें सिकुड़ीं, और उसकी धड़कन तेज़ हो गई, समझ नहीं पा रही थी कि यह क्या था। उस औरत ने कोई शब्द नहीं बोला, लेकिन उसके होंठों के कोने से एक सूखी हंसी गूंज उठी, जो किसी मृत आत्मा की आवाज़ जैसी थी—घोर, चुप, और दिल दहला देने वाली।

अमिता ने कदम पीछे खींचने की कोशिश की, लेकिन जैसे ही वह मुड़ी, उसकी आँखों के कोने में उसने देखा कि आसपास के घरों की खिड़कियाँ अब खुली थीं। और वे खिड़कियाँ नहीं थीं एक अजीब सी छाया थी, जैसे कोई निगाहें उसे लगातार देख रही हों, बिना किसी चेहरे के। हवा में एक अजीब सी गंध आ रही थी, जैसे सड़ी हुई माँस की—वह घबराई, लेकिन खुद को संभालने की कोशिश की।

उस औरत की आँखों में अब एक घृणा और डर के साथ कुछ और था—वह जैसे कुछ कहना चाहती हो, लेकिन शब्द उसके मुँह से बाहर नहीं आ रहे थे। उसकी उंगलियाँ एक अजीब तरीके से कांप रही थीं, जैसे वह किसी असाधारण शक्ति से जकड़ी हो।

“नमस्ते,” अमिता ने कहा, उसकी आवाज़ ने सन्नाटे को चीर दिया, लेकिन जैसे ही शब्द हवा में फैले, एक घना शांति ने उसे वापस निगल लिया। औरत ने जोर से झटका खाया, और उसकी आँखें चारों ओर घूमें, जैसे कुछ बुरा होने वाला हो, जैसे वह खुद किसी अदृश्य ताकत से जकड़ी हो। उसकी आँखों में एक गहरी, भयावह दहशत थी, और उसकी धड़कनें तेज़ हो रही थीं, जैसे कुछ अज्ञात वह सहन नहीं कर पा रही थी।

“क्या आप हिंदी बोलती हैं?” अमिता ने फिर से पूछा, एक कदम और बढ़ते हुए। उस औरत की आँखों में एक घृणा और डर का मिश्रण था, और जैसे ही अमिता ने और कदम बढ़ाया, उस औरत ने डर से अपना हाथ मुँह पर रख लिया, जैसे कुछ कहने से पहले उस शब्द का कोई असर न हो। उसकी अंगुलियाँ कांप रही थीं, और उसकी आँखें फटी हुई थीं, जैसे वह कुछ देख रही हो, जो अमिता के लिए नज़र नहीं आ रहा था। अचानक, एक तेज़, घबराहट भरी आवाज़ आई, जैसे कोई उसके कान के पास फुसफुसा रहा हो—“यहाँ रहना मुमकिन नहीं... भाग जाओ।”

फिर, उस औरत ने सिर झटका और पल भर में घर के अंदर भाग गई, लेकिन इस बार उसके पीछे कुछ और था—एक छायादार आभास, जो जैसे उसकी परछाईं के नीचे एक और रूप ढूंढ रहा था। दरवाजा जोर से बंद हो गया, और एक कड़ी आवाज़ गूंज उठी, जैसे किसी भूतिया दरवाजे का शोर जो सीधे अमिता की रीढ़ में घुसकर उसे जमा देता। यह आवाज़ इतनी तेज़ और अप्राकृतिक थी कि जैसे यह ज़मीन से उठकर अमिता के भीतर घुसने की कोशिश कर रही हो।

अमिता खड़ी रह गई, उसकी आँखों में उलझन और डर का मिश्रण था, और साथ ही एक अजीब सा एहसास था कि वह अकेली नहीं थी। क्या हो रहा था यहाँ? क्या वह जो देख रही थी, वह केवल उसका भ्रम था या इस गाँव के भीतर कुछ खौ़फनाक और भयानक छिपा हुआ था? उसकी साँसों की आवाज़ अब उसके कानों में गूंज रही थी, और अचानक उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे चारों ओर से अंधेरे की सायं-सायं उसे घिर रही हो, कोई उस पर निगाह रखे हुए हो।

वह इशारा

गाँव के चौक में खड़ा सन्नाटा और भी गहरा हो गया, जैसे हवा भी खामोश हो गई हो। आकाश का रंग अब काला हो चुका था, और उसमें गहरे भूरे और रक्तिम धब्बे फैले हुए थे, जैसे आसमान भी किसी भूतिया महल का हिस्सा हो। एक ठंडक महसूस हो रही थी, जैसे हवा में कोई खौफनाक शक्ति छुपी हो, जो हर साँस के साथ बढ़ती जा रही थी। वह ठंडी हवा अमिता की त्वचा को चीरती हुई अंदर तक घुस रही थी, जैसे कोई अदृश्य ताकत उसे खींचने की कोशिश कर रही हो। धीरे-धीरे, और गाँववाले अपने घरों से बाहर निकलने लगे, लेकिन उनके चेहरे बिना भाव के थे, जैसे वे खुद को किसी अन्य दुनिया में खो चुके हों। उनकी चालें जैसे जानबूझकर धीमी और अस्वाभाविक थीं, जैसे कोई बुरी शक्ति उन्हें नियंत्रित कर रही हो। उनके कदम ऐसे थे जैसे उन्हें किसी अनदेखी चीज़ से निर्देश मिल रहे हों, और उनके मुँह से एक भी शब्द नहीं निकल रहा था। वे अमिता को एकदम शांत, घूरने वाली आँखों से देख रहे थे—उनकी आँखों में कोई भावना नहीं थी, बस एक गहरी शून्यता थी, जैसे उनकी आत्माएँ कहीं खो गई हों।

अचानक, एक अजीब सी गूँज सुनाई दी, जैसे किसी बहुत पुरानी, कटी हुई ध्वनि में से आवाज़ निकल रही हो, और एक हल्की सी झपकी लगी, जैसे उस सन्नाटे के बीच कोई डरावनी ध्वनि छुपी हो। उनकी आँखें अब कुछ और घूरने लगीं, जैसे उनकी परछाईं भी अमिता के इर्द-गिर्द गुम हो गई हो। एक अजीब सी चुप्पी थी, जो किसी खौफनाक अनुष्ठान का हिस्सा लग रही थी, और उस चुप्पी में कुछ था—कुछ जो उसे घेरने के लिए धीरे-धीरे आ रहा था।

और फिर, एक ऊँचा, दुबला आदमी, जो पहले से ही चौक के किनारे खड़ा था, और अब उसके आस-पास भी कोई था, जो धीरे-धीरे उसकी परछाईं में समा रहा था। उसकी आँखों में एक घना अंधकार था, जैसे उस अंधेरे में कुछ और भी था, कुछ जो देखने पर भी नजर नहीं आता। जैसे ही उसने अपने हाथ से जंगल की ओर इशारा किया, उसकी आँखें एक खौ़फनाक चेतावनी दे रही थीं—यह इशारा केवल एक दिशा का नहीं था, बल्कि अमिता को एक अनजानी मौत का संकेत था।

उसकी आँखें अब अमिता को घूर रही थीं, और इस बार उनमें गहरी चुप्पी और अंधेरे की छाया का एहसास था। जैसे उसने किसी खतरे को पहचान लिया हो और अब वह उसे सीधा अपनी ओर खींचने की तैयारी कर रहा हो। उस आदमी के इशारे में एक घना रहस्य था, जैसे वह उसे उस जंगल के भीतर भेजने का आदेश दे रहा हो, जहाँ से कोई वापस नहीं लौटता।

बिना सोचे, अमिता ने जंगल की दिशा में कदम बढ़ा दिए, और जैसे ही वह वहाँ पहुँची, हवा की ठंडक और भी गहरी हो गई, जैसे उस ठंडक में कोई अदृश्य शक्ति समाई हो। यह कुछ ऐसा था, जैसे खुद वातावरण उसे अंदर खींचने की कोशिश कर रहा हो, जैसे हर कदम पर जंगल की मिट्टी में छुपे हुए साए उसे अपनी ओर खींच रहे हों। हवा में गहराई से सड़ा हुआ गंध था, जैसे मृत शवों की दुर्गंध फैल रही हो। जैसे ही अमिता ने एक कदम और बढ़ाया, एक हल्की सी फुसफुसाहट ने उसकी कानों में गूंज उठी—सुर्र्र… सुर्र्र… ऐसा लग रहा था जैसे कोई उसकी पीठ के ठीक पीछे खड़ा हो, लेकिन जब उसने पलट कर देखा, तो वहाँ कुछ भी नहीं था।

अंधेरे में एक डरावनी चुप्पी महसूस हो रही थी, जैसे समय भी रुक गया हो। पेड़ों की शाखाएँ निश्चल थीं, लेकिन फिर भी उनके बीच से एक हल्की सी सरसराहट सुनाई दी, जैसे किसी की धीरे-धीरे सांसें निकल रही हों। अमिता का दिल धड़कते हुए तेज़ी से बढ़ने लगा, और उसे लगा जैसे उसके चारों ओर कोई गहरी, रहस्यमय निगाहें उसे घेर रही हों। यह सन्नाटा उसे गहरी नीरवता की तरह समेट रहा था, जैसे किसी भूतिया शक्ति ने जंगल को अपनी पकड़ में ले लिया हो।

एक पल के लिए, अमिता को लगा जैसे खुद जंगल ने उसे पहचान लिया हो—जैसे यह उसे अंदर समा लेने के लिए तैयार हो। अचानक, उसने महसूस किया कि उसके पैर भारी हो गए हैं, जैसे वह अपनी इच्छा के खिलाफ खुद को ज़मीन में धँसता हुआ महसूस कर रही हो। वह कोशिश करती रही, लेकिन जैसे-जैसे वह आगे बढ़ती गई, उसकी रफ़्तार और धीमी होती चली गई, जैसे जंगल उसे थाम रहा हो, जैसे वहाँ कुछ खौ़फनाक मौजूद हो, जो उसे रोकने की कोशिश कर रहा हो।

फिर, कुछ दूर से एक घनी और धीमी आवाज़ आई, जैसे किसी के पैरों की आवाज़ धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ रही हो। अमिता ने सिहरते हुए देखा, लेकिन वह केवल घना अंधेरा था, जो जैसे उसके सामने से निकलने के लिए तैयार था। इस बार, वह जानती थी कि यह केवल उसका भ्रम नहीं था। वह हवा में हल्की सी खींचतान महसूस कर सकती थी, जैसे कोई उसे अपने घेरे में जकड़ने की कोशिश कर रहा हो।

जंगल की रूह

जैसे ही वह जंगल के भीतर गहराई तक गई, गाँव की हल्की-सी आहट भी पूरी तरह गायब हो गई। अब वहाँ केवल एक अजीब, दबाव डालता हुआ सन्नाटा था, जो उसकी सांसों को भी रोक देना चाहता था। उसकी फ्लैशलाइट अचानक झपकी और बुझने जैसी हुई, और उसी क्षण, सामने एक विशाल, डरावनी संरचना उभर आई—एक प्राचीन पत्थर का वेदी, जो काले धब्बों और समय की मार से टूटी हुई लग रही थी। उस पर अजीब, विकृत चित्र और अज्ञात प्रतीक उकेरे गए थे, जिनमें से कुछ ऐसे थे मानो वे खुद ही हिल-डुल रहे हों, जैसे पत्थर के भीतर कोई दबी हुई आत्मा सांस ले रही हो।

उस वेदी के चारों ओर ज़मीन पर किसी शैतानी अनुष्ठान के अवशेष बिखरे पड़े थे—लाल और काले वस्त्र, जिनसे अब भी गंधक और खून जैसी सड़ी हुई बदबू आ रही थी। जगह-जगह जली हुई हड्डियाँ बिखरी थीं, जिन पर काले धब्बे और राख चिपकी हुई थी। एक मानव खोपड़ी बीच में रखी थी, उसकी खोखली आँखों से ऐसा लगता था जैसे वह अमिता को घूर रही हो। जैसे-जैसे वह पास गई, उसे महसूस हुआ कि खोपड़ी की मुस्कान और चौड़ी हो रही है।

अचानक, उसे लगा जैसे उस जगह से ठंडी लपटें उठ रही हों—न दिखने वाली आग की तरह—जो उसकी त्वचा को जलाए बिना भीतर तक चीर रही थीं। पेड़ों के पीछे से हल्की-सी फुसफुसाहट सुनाई दी—भारी, धीमी आवाज़ें, जो किसी प्राचीन भाषा में मंत्रोच्चार कर रही हों। उसकी फ्लैशलाइट फिर से झपकी, और एक पल के लिए उसने देखा कि वेदी पर बने प्रतीकों से गाढ़ा, काला तरल रिस रहा है, जैसे पत्थर खुद खून बहा रहा हो।

अमिता के भीतर एक सर्द लहर दौड़ गई। उसकी रूह काँप उठी, मानो उसकी हड्डियों तक बर्फ घुस गई हो। उसने महसूस किया, यहाँ कोई ऐसी प्राचीन शक्ति दबी हुई है, जो सदियों से इस स्थान पर जंजीरों में बँधी तड़प रही है—और अब उसकी नींद टूट रही है। जैसे ही वह वेदी के पास पहुँची, उसकी आँखें उन विकृत चित्रों पर टिक गईं—आदमी, जो अपनी ही त्वचा नोंचते हुए चीख रहे थे। और उनके ऊपर, एक काले धुएँ में लिपटी, एक शैतानी आकृति खड़ी थी, जिसकी आँखें लाल अंगारों की तरह चमक रही थीं।

अचानक, अमिता के चारों ओर हवा भारी हो गई। पेड़ों से पत्ते गिरे, मगर गिरते ही राख में बदल गए। उसकी सांसें जैसे किसी अदृश्य हाथ ने पकड़ ली हों। तभी उसने महसूस किया—एक उपस्थिति। इतनी भारी कि उसके कंधे झुकने लगे।

उसका दिल इतनी तेज़ धड़कने लगा कि जैसे कोई उसे भीतर से तोड़ रहा हो। उसने झटके से पीछे मुड़कर देखा—अंधेरे में सिर्फ पेड़ों की टेढ़ी-मेढ़ी परछाइयाँ थीं, मगर उन परछाइयों में से कुछ धीरे-धीरे हिल रही थीं। फिर भी कोई दिखाई नहीं दे रहा था। लेकिन उस सन्नाटे ने उसे इस तरह जकड़ लिया था जैसे कोई उसकी गर्दन पर ठंडी, बर्फीली उंगलियाँ कस रहा हो।

तभी, उसके कान के बिल्कुल पास एक धीमी, गहरी आवाज़ फुसफुसाई—
“बोलो... और वह आएगा।”

अमिता की आँखें चौड़ी हो गईं। उसका पूरा शरीर सुन्न हो चुका था। और फिर, सबसे भयानक बात—उसे अपनी ही आवाज़ सुनाई दी, बेहद हल्की, लगभग दबे स्वर में—
“क्या आप हिंदी बोलती हैं?”

वह ठिठक गई। यह उसकी आवाज़ थी—लेकिन उसने अभी कुछ कहा नहीं था।

उसके चारों ओर अंधेरा अचानक हिलने लगा। पेड़ झूमे, जैसे किसी अनदेखे तूफान ने उन्हें घेर लिया हो। वेदी पर बने प्रतीक चमकने लगे, और खोपड़ियों से धुआँ उठने लगा।

अमिता भागने के लिए मुड़ी, लेकिन उसके पीछे गाँववाले खड़े थे। उनकी आँखें अब लाल अंगारों की तरह चमक रही थीं। उनके होंठ धीरे–धीरे हिल रहे थे, मानो कोई मंत्र जप रहे हों—बिना आवाज़ के।

और फिर, जंगल में एक परछाई उठी। लंबी, विकृत, मानवीय आकार से बड़ी। उसके साथ ठंडी हवा का एक झोंका आया।

आवाज फिर गूँजी—
“तुमने बोल दिया है। अब वह आ चुका है।”

अमिता चीखना चाहती थी—लेकिन उसके होंठ नहीं खुले।

और अब अमिता भी उस गाँव का हिसाब बन चुकी थी।


“एक हफ्ते की खोजबीन के बाद, अमिता की लाश जंगल के बीच उस वीरान, सदियों पुराने उजाड़ कब्रिस्तान के पास मिली। पोस्टमॉर्टेम में सामने आया कि उसकी मौत आठ दिन पहले ही हो चुकी थी—दिल का दौरा कहकर बात ख़त्म कर दी गई। लेकिन सवाल अब भी वही है—क्या सिर्फ़ ‘हार्ट अटैक’ ही उसकी मौत की वजह थी? क्योंकि आज भी वह खामोश गाँव वहीं है… अंधेरे में छुपा हुआ, अपने अगले शिकार का इंतज़ार करता हुआ।”

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