घना जंगल चारों ओर फैला था। पुराने साल और पीपल के पेड़ों की छाया ने चाँदनी को पूरी तरह निगल लिया था। कहीं-कहीं तनों पर सूखे खून जैसे काले धब्बे फैले थे, और लटकती जड़ों में टूटे कंगन और चूड़ियों के टुकड़े उलझे दिखते थे। अंधेरे में झाड़ियों को चीरते हुए अजय आगे बढ़ रहा था। हर कदम पर लगता मानो पीछे कोई अनदेखा साया उसी की चाल दोहरा रहा हो। वह एक अनुभवी ट्रैकर था, लेकिन इस बार उसके दिल में अजीब-सी बेचैनी थी—जैसे जंगल की मिट्टी उसके पैरों को पकड़कर रोकना चाह रही हो।
कभी अचानक कोई उल्लू चिल्ला उठता, तो कहीं पास ही से बच्चों के रोने जैसी धीमी आवाज़ सुनाई देती। उसका इरादा देर तक रुकने का नहीं था—सांझ कब गहराती रात में बदल गई, उसे पता ही न चला। उसकी टॉर्च की रोशनी बार-बार झिलमिलाती, मानो अंधेरा किसी जिन्न की तरह उसे निगलना चाहता हो। लेकिन उसे सबसे ज़्यादा डरा रही थी वो पगडंडी—जो अभी कुछ पल पहले वहाँ थी ही नहीं। वह पगडंडी हल्की-हल्की धुँध से ढकी थी
वह पगडंडी अजीब-सी थी। किनारों पर नींबू-मिर्च, टूटी खोपड़ियाँ और राख बिखरी थी। मिट्टी गीली होकर ऐसे चमक रही थी, जैसे किसी ने अभी-अभी बलि दी हो। मन बार-बार लौटने को कह रहा था, पर जिज्ञासा उसके पैरों को खींच रही थी। जैसे ही उसने उस पगडंडी पर कदम रखा, हवा बदल गई। ठंडी सनसनाहट पूरे जंगल में फैल गई, और रात की सामान्य आवाज़ें—झींगुरों की टर्र-टर्र, उल्लुओं की हूट—सब एकदम थम गईं। जैसे पूरा जंगल साँस रोके खड़ा हो।अजय की साँसें भारी हो गईं। उसे बचपन में सुनी गाँव की कहानियाँ याद आईं—“ये रास्ते वनदेवी खुद चुनती हैं… जो इसमें उतर गया, वो डाकिनी की भेंट चढ़ जाता है।”
वक़्त जैसे थम-सा गया। दिन में यह छोटा-सा रास्ता रात के अँधेरे में घंटों लम्बा खिंचता चला जा रहा था। चारों ओर जंगल में बदलाव होने लगे —पेड़ बूढ़े, टेढ़े-मेढ़े और डरावनी शक्लों जैसे हो गए। उनकी टहनियाँ ऐसे फैल रही थीं, मानो हड्डियों से बने हाथ उसे पकड़ने को बढ़ रहे हों। कहीं किसी तने पर सूखी खाल चिपकी थी, और कहीं लटकती जड़ों से टूटी हड्डियाँ खनक रही थीं। ज़मीन नरम और गीली थी, और चलते ही उसमें से बुलबुले फूटते, जैसे अंदर कुछ जीवित दबा हो और बाहर आने की कोशिश कर रहा हो। हवा में सड़ी मांसपेशियों और राख की गंध भर गई थी।
अजय के कानों में बड़ी धीमी फुसफुसाहटें गूँजने लगीं—कभी बच्चे रोते हुए लगते, कभी किसी औरत का करुण विलाप। उसकी टॉर्च की रोशनी जैसे ही किसी पेड़ पर पड़ी, छाल पर चेहरे उभर आए—खोखली आँखों वाले, मुँह फाड़कर चीखते हुए।
डर के मारे वह तेज़ी से दौड़ पड़ा। साँसें हाँफतीं, टहनियाँ उसके कपड़ों को नोचतीं, और पीछे से मानो कोई परछाई लगातार उसका पीछा कर रही हो। जंगल अचानक थम गया—और उसके सामने मीलों तक फैला एक सुनसान, सूखा मैदान था, जहाँ न घास थी न हरियाली, बस जली हुई मिट्टी और राख बिखरी थी। घबराहट में आगे बढ़ते ही उसका पैर किसी ठोस, सख़्त चीज़ से टकराया। वह लड़खड़ाकर ज़मीन पर गिर पड़ा—और नीचे हाथ रखते ही उसे अहसास हुआ… वह कोई पत्थर नहीं, बल्कि किसी इंसान की ठंडी हड्डी थी।
वह उठा और वो अब भी जंगल की उस पगडण्डी पर ही था।
आसमान में अजनबी तारे टिमटिमा रहे थे—ऐसे आकार और रंग, जिन्हें उसने कभी नहीं देखा था। वे मानो धरती की ओर झुककर उसे घूर रहे हों। चारों ओर के पेड़ जले, सड़े और काले हो चुके थे, उनकी टहनियाँ राख से ढकी हड्डियों जैसी लग रही थीं। कुछ पर तो मानो झुलसी हुई खाल लटक रही थी, और कहीं से हल्की कराहट जैसी आवाज़ निकल रही थी, जैसे वो पेड़ अब भी ज़िंदा हों। हवा में लोहे और खून जैसा स्वाद घुला था, जिससे उसका गला सूखने लगा। दूर कहीं ज़मीन हिलाने वाली भारी-भरकम चीज़ की गूँज सुनाई दी—धीमी, मगर इतनी गहरी कि उसके सीने तक कंपन पहुँच गया।
अब सामने का रास्ता बीमार हरे उजाले में थरथरा रहा था—मानो ज़हरीली साँप की जीभ बार-बार बाहर-भीतर हो रही हो। अजय ने पीछे मुड़कर देखा तो वापसी का रास्ता गायब हो चुका था। उसकी जगह अब सिर्फ़ घना, काला जंगल था, जिसमें अंधेरा ऐसे फैला था जैसे वह ज़िंदा होकर उसे निगलने का इंतज़ार कर रहा हो। उसकी साँसें थम गईं। उसे एहसास हो गया—वह फँस चुका था, और जंगल अब उसका क़ैदखाना बन चुका था।
तभी झाड़ियों में तेज़ सरसराहट हुई—मानो कोई जानवर नहीं, बल्कि सूखी हड्डियाँ आपस में रगड़ रही हों। अजय ने काँपते हाथ से टॉर्च घुमाई। पहले तो कुछ नहीं दिखा, लेकिन रोशनी के धुंधलके में अचानक तीन आकृतियाँ धीरे-धीरे बाहर निकलीं। उनके चेहरे पीले और मृतक जैसे थे, आँखें खोखली गुफाओं की तरह काली। उनके शरीर से सड़ी मिट्टी और राख की गंध उठ रही थी।
“क…कौन हो तुम?” अजय की आवाज़ फटी और काँप उठी।
एक बिखरी दाढ़ी वाला बूढ़ा आदमी आगे बढ़ा। उसके पैरों से खून टपक रहा था, लेकिन वह दर्दरहित, स्थिर खड़ा था। उसकी आवाज़ गहरी और फटी हुई थी, जैसे हज़ारों साल से दबा कराह एक साथ बाहर निकल आया हो—
“तुम्हें यहाँ नहीं होना चाहिए था… अब बहुत देर हो चुकी है।”
उसके पीछे एक औरत थी। उसके गाल पर पुराना घाव का गहरा निशान था, और उसके लंबे बाल ऐसे लटक रहे थे जैसे गीले साँप। उसकी आँखों में खालीपन और होंठों पर हल्की-सी मुस्कान थी—भयानक, पर रहस्यमयी। और उनके साथ एक जवान लड़का था, जिसके चेहरे पर डर जम चुका था। उसकी आँखें स्थिर थीं, मानो उसने कोई ऐसा भय देखा हो, जिसे शब्दों में बयाँ नहीं किया जा सकता।
औरत ने धीमे स्वर में कहा—उसकी आवाज़ मानो कान में नहीं, सीधे आत्मा में गूँज रही थी—
“ये रास्ता हमें खुद चुनता है। एक बार इसमें खिंच आए, तो लौटना नामुमकिन है,
अजय का गला सूख गया।
लड़के ने काँपते होंठों से फुसफुसाया—“सिर्फ़ एक ही वापस जा सकता है। बाकी सब… रास्ते में समा जाते हैं।”
“बकवास!” अजय चीख पड़ा। “कोई न कोई रास्ता ज़रूर होगा यहाँ से निकलने का!”
पर बूढ़ा आदमी थकी, बुझी आँखों से बोला—
“हम सालों से यहाँ भटक रहे हैं। हर रात ये पगडंडी हमें नई जगह खींच ले जाती है—हर बार और भी भयानक, और भी श्रापित। यहाँ से भागना नहीं है… ये तय करने की है कि कौन बचेगा।”
उसके इतना कहते ही पूरा जंगल अचानक गरज उठा—जैसे धरती के भीतर कोई राक्षस कराह रहा हो। पेड़ों की डालियाँ चरमराईं, पत्ते खून की तरह टपकने लगे। औरत काँप उठी। उसकी आँखें भय से फैल गईं—
“वो… आ रहा है!”
अचानक ज़मीन हिलने लगी। तीनों आकृतियाँ और अजय भाग पड़े। चमकता हुआ रास्ता आगे फैलता गया, और जंगल उनके चारों ओर कराहने लगा। डालियाँ पंजों की तरह झपट रही थीं, पेड़ टेढ़े होकर रास्ता रोकने लगे। हवा में फुसफुसाहटें गूँज रही थीं—*“बलि दो… बलि दो…”*
अजय का दिमाग दौड़ा। यह सहनशक्ति की नहीं, बल्कि बलिदान की परीक्षा थी। रास्ता एक बली चाहता था।
अचानक एक आवाज़ उसके कानों में गूँजी—फुफकारती, डरावनी, साँप जैसी—
“चुनो… वरना चुने जाओगे।”
अजय रुक गया और वह बाकी तीनो भी रुक गए। उसके हाथ काँप रहे थे, माथे पर पसीना टपक रहा था। क्या वह दूसरों की मौत पर अपनी जान बचा सकता था? आवाज़ और ज़ोर से गूँजी—
“चुनो…”
और तभी, जैसे कोई अदृश्य शक्ति उसके हाथ पकड़ रही हो, अजय ने उस जवान लड़के को ज़ोर से धक्का दे दिया। लड़के की चीख पूरे जंगल में गूँजी—लंबी, विदारक चीख। अगले ही पल वह अंधेरे में समा गया, और गहराई से हड्डियाँ टूटने जैसी आवाज़ आई।
बाकी दोनों आकृतियाँ बिना पीछे देखे दौड़ते रहे। वे जानते थे। हमेशा से जानते थे।
और अब… रास्ता शांत हो गया। हवा हल्की हो गई, गरज थम गई, जंगल का बोझ उतर गया। पगडंडी ने अपना हिस्सा ले लिया था।
कुछ देर बाद अजय एक खुले मैदान में पहुँचा। सुबह की किरणें उसके चेहरे पर पड़ीं, मगर धूप गर्म नहीं थी—ठंडी और निःसत्व, जैसे कब्र से निकली राख। अजय ने अपने हाथों को देखा। उंगलियों पर अब भी उस लड़के की पकड़ की नमी थी। उसने मुट्ठी कस ली, पर वह एहसास मिटा नहीं।
चलते-चलते अचानक उसे लगा—उसके कदम उसके अपने नहीं हैं। जैसे किसी अदृश्य डोर से बंधे हों। हर बार जब वह बाहर निकलने की कोशिश करता, जंगल धीरे-धीरे फिर उसी पगडंडी का आकार लेने लगता। और फिर—वो फुसफुसाहट।
"अब तू है रखवाला।"
कुछ देर बाद, दूर से एक और आवाज़ आई। किसी के पैरों की घास पर चरमराहट। एक नया शिकार… कोई और, जिसने उस पगडंडी पर क़दम रख दिया था।
अजय का गला सूख गया। उसकी आँखें अब टॉर्च की तरह चमक रहीं थीं—अंधेरे में रास्ता दिखाने के लिए, पर असल में शिकार को और भीतर खींचने के लिए।
उसके भीतर दो आवाज़ें लड़ रही थीं। एक इंसानी—“रुको, भाग जाओ, चेतावनी दो।”
और दूसरी—वही जंगल की—“मत रोक। ये रास्ता तुझसे गुज़रे बिना नहीं बचेगा।"
जैसे-जैसे कदमों की आवाज़ पास आई, अजय ने जाना—अब वह अजय नहीं रहा।
अब वह पगडंडी का रखवाला था...!!!!
डर यहीं खत्म नहीं होता… अगली कहानी और भी भयावह है। पढ़ते रहिए और फॉलो कीजिए Bhoot Kahani—जहाँ हर पन्ना आपको सिहरन देगा।

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