फिर… मिलेंगे….!


यह घटना है 5 मार्च 2018 की।

उत्तराखंड की सुनसान पहाड़ियों में रात उतर चुकी थी। काले बादल आसमान को ढँक चुके थे और अचानक बारिश ऐसी बरसने लगी मानो पहाड़ पूरा फटकर बह निकले हों।

अमित चौहान, देहरादून का रहने वाला, अपनी कार से रानीखेत से लौट रहा था। गाड़ी की हेडलाइट्स मुश्किल से धुंध और बारिश को चीर पा रही थीं। सड़क पर पानी की धाराएँ किसी सांप की तरह फिसल रही थीं और हवा में गीली मिट्टी और सड़न की मिली-जुली गंध थी।

तभी अमित की नज़र पेट्रोल इंडिकेटर पर पड़ी—पेट्रोल लगभग खत्म होने वाला था।

यह देखकर उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा। इस वीराने में गाड़ी बंद हो गई तो मदद कौन करेगा?

सड़क के किनारे गाड़ी रोककर उसने एक डब्बा उठाया और तीन किलोमीटर दूर पेट्रोल पंप की तरफ पैदल ही चल पड़ा।

बारिश इतनी तेज़ थी कि हर बूंद चुभते हुए काँटे जैसी लग रही थी। सड़क पर अंधेरा, जंगल से आती अजीब सरसराहट और दूर कहीं से कोई जानवर की कराह… सब मिलकर एक दहशत पैदा कर रहे थे।

करीब आधे घंटे बाद, अचानक पीछे से आ रही कार की हेडलाइट्स चमकीं। 
अमित ने पीछे मुड़ कर देखा, एक पुरानी सफेद एम्बेसडर धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ रही थी।

“इनसे लिफ्ट मांग लेता हूँ पेट्रोल पंप तक पहुँचने के लिए…” अमित ने सोचा।

कार उसके पास आकर रुकी। शीशा धीरे-धीरे नीचे उतरा।

अंदर बैठा एक बूढ़ा आदमी दिखाई दिया।
उसका चेहरा पीला-सफ़ेद, जैसे सारी ख़ून की नमी खींच ली गई हो। आँखें इतनी बड़ी और गहरी कि सीधे आत्मा तक झाँकती हों। उसने काला कोट और पुरानी टोपी पहन रखी थी। सबसे डरावनी बात यह थी कि बारिश में भी उसके कपड़े एकदम सूखे थे।

अमित का गला सूख गया। उसके मन ने चीख़कर कहा—“भागो!”
लेकिन पैर पत्थर जैसे भारी हो गए।

अमित की सांसें तेज़ हो रही थीं। बारिश की आवाज़ और सड़क की जलधाराएँ उसे और भी डरावनी लग रही थीं। उसने हिम्मत जुटाई और कहा, “अगर आप मदद करना चाहें… तो मुझे पास के पेट्रोल पंप तक छोड़ दें।”

बूढ़ा आदमी सिर हिलाता है, लेकिन उसकी धीमी मुस्कान अब और भयानक लग रही थी।वह बूढ़ा हल्की मुस्कान के साथ बोला।

उसकी आवाज़ पतली, टूटी-फटी… जैसे किसी बंद ताबूत से हवा रिस रही हो—
“बैठो… छोड़ देता हूँ।”

डर और मजबूरी ने अमित को कार में बैठने पर मजबूर कर दिया।

अमित धीरे-धीरे कार में बैठा। जैसे ही उसने सीट बेल्ट लगाया, सीट इतनी ठंडी थी कि ऐसा महसूस हुआ जैसे कोई परछाई उसके शरीर पर उतर आई हो।

जैसे ही दरवाज़ा बंद हुआ, भीतर का माहौल बदल गया।
अचानक इतनी ठंडक छा गई कि अमित की साँसें भाप बनकर निकलने लगीं।
हवा में गीली मिट्टी नहीं, बल्कि जली हुई लकड़ियों और राख की बदबू भर गई थी।

बूढ़ा चुपचाप गाड़ी चलाता रहा।
उसकी आँखें बार-बार रियर व्यू मिरर से अमित को घूर रही थीं।

“आप… अक्सर यहाँ आते हैं?” अमित ने हिम्मत करके पूछा।

बूढ़े आदमी ने धीरे से अपना सिर घुमाया, उसकी गहरी और खाली आंखें सीधे अमित की आँखों से टकराई, अपनी भयानक और डरावनी आवाज़ में बोला
“ना… कभी-कभी… मरे हुए भी सफ़र करना चाहते हैं।”

यह सुनते ही अमित का दिल डर के मारे और तेज़ी से धड़कने लगा। उसके कानों में बूढ़े की आवाज़ जैसे सदियों पुरानी कब्र से उठ रही हो, और बारिश की आवाज़ उस आवाज़ के साथ मिलकर मन में सीधे डर की छड़ी घोंप रही थी।

कुछ देर बाद बूढ़े आदमी ने जेब से एक पुराना, पीला पड़ चुका कागज़ निकाला। कागज़ गीला नहीं था, लेकिन उसमें से एक अजीब सी गंध निकल रही थी—जैसे पुराने शव से आती हो। उसने वह अमित को पकड़ा दिया।

उस पर लिखा था—एक नाम, फोन नंबर और पता।

अमित ने राहत की साँस ली जब पेट्रोल पंप नज़र आया। जल्दी से उतरते हुए उसने कहा—
“थ… थैंक यू, अंकल।”

बूढ़ा फिर मुस्कुराया। उसकी मुस्कान इस बार और चौड़ी थी, दाँत पीले और टेढ़े-मेढ़े नज़र आ रहे थे।
और उसने उसी ठंडी आवाज़ में कहा—
“फिर… मिलेंगे…”

उसकी आवाज़ सुनकर अमित के पूरे शरीर में जैसे हज़ारों बर्फ़ की सुइयाँ चुभ गईं।

अगली सुबह अमित को लगा कि यह सब एक बुरा सपना था।
लेकिन अख़बार खोला, तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।

रानीखेत के पास कार एक्सीडेंट की ख़बर थी।
मरने वालों में वही चेहरा था—वही बूढ़ा आदमी, काले कोट और टोपी वाला।

तभी उसे याद आया की बूढ़े ने उसे एक कागज़ दिया था उसने पैंट की जेब से कागज़ निकला और काँपते हाथों से उस नंबर पर कॉल करने लगा जो कागज़ पर लिखा था।

फ़ोन उठाने वाली औरत बोली—

“आप किससे बात करना चाहते हैं? राजेश?… अरे उन्हें तो मरे पाँच साल हो चुके है! उसने गले पर गोली चला ली थी… गला छलनी हो गया था... ! जिसकी वजह से उनकी मौत हो गयी थी वह मेरे पति थे "

अमित का दिल जैसे थम गया।
उसने काँपते हुए कागज़ को फिर देखा।

इस बार उस पर नाम, नंबर पता नहीं लिखा हुआ था बल्कि पीछे खुरदरी लिखावट में लिखा था—
“फिर… मिलेंगे…”

अमित यही सोचता रह गया की अगर राजेश पांच साल पहले मर चूका है तो वह कौन था जिसने कल रात को मुझे लिफ्ट दी थी और यह कागज़ दिया था...!!!

और पाँच साल पहले मर चुके आदमी की मौत की खबर आज के अख़बार में क्यों छपी है । अमित ने वापस उस नंबर पर कॉल करने की कोशिश की पर वह नंबर उसके कॉल रिकॉर्ड से अपने आप डिलीट हो चूका था। 

यह रहस्य अमित आज तक नहीं सुलझा पाया।

आज भी, जब अमित अकेला पहाड़ी रास्तों पर चलता है,
बारिश की बूंदों के बीच वही टूटी-फटी, 
डरावनी आवाज़ गूँजती है

“फिर… मिलेंगे…”


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