बरसों बाद आज जब मैं उस कब्रिस्तान की सड़क से गुज़ारा तो 16 साल पहले बीते दिनों की यादों ने मुझे चारों ओर से घेर लिया, उन यादों में थी उस कब्रिस्तान की डरावनी और खौफनाक कहानियाँ। मैंने बाइक रोकी और गुस्से भरी नज़र से उस कब्रिस्तान को देख रहा था जो आज भी रात की अँधेरी चादर ओढ़े कोहरे के पर्दे के पीछे छुपा था। एक ऐसा कब्रिस्तान जहाँ की हवाओं में आज भी रूहों की फुसफुसाहट है, जहाँ चाँद की रोशनी में परछाइयाँ नाचती नज़र आती है, जहाँ परिंदे भी रात गुज़ारने नहीं आते है। समय की मार ने कब्रों के पत्थरों की रंगत को फीका कर दिया था, कब्रों पर लिखे मृतकों के पुराने नाम और तारीखें समय के साथ धुंधली हो गई थीं। सूखे पत्ते से ढकी थी वहाँ की ज़मीन, जंगली घास फूस कई कब्रों पर उगी हुई दिखाई दे रही थी। ठण्ड के मारे जकड़े किसी मुर्दे की तरह ख़ामोशी से अपनी बाँहनुमा टहनियाँ फैलाये खड़े थे उस कब्रिस्तान के सारे पेड़। दिल में खौफ और आँखों को दहशत से भर देना वाली कई घटनाओ का केंद्र रहा है यह कब्रिस्तान। 550 साल पुराना यह कब्रिस्तान प्रेत, भटकती रूहें, जिन्नात, डायन, चुड़ैलों हर किसी का घर रह चूका है। यह वह कब्रिस्तान है जिसकी कहानियों ने अक्सर लोगो को अपनी ओर खींचा है।
मेरी नज़र की लय को वहाँ से गुज़रती एक ट्रक के हॉर्न ने थोड़ा दिया, मैंने बाइक स्टार्ट की और होटल की ओर चल दिया। आज मेरी इस कहानी की प्रेरणा भी इसी कब्रिस्तान
में हुए एक दिल दहला देने वाली एक ऐसी ही घटना से है जो आज भी वहाँ रह रहे स्थानिए लोगो के बीच एक चर्चा का विषय है।
साल 2008, आज मेरी 12 वीं क्लास का फाइनल और आखिरी पेपर था, एग्जामिनेशन हॉल से बाहर आकर सब दोस्त आखिर बार एक दूसरे से मिल रहे थे और कसमे वादे कर रहे थे की टच में रहेंगे। मैं बड़े गौर से यह सब देख रहा था तभी पीछे से आवाज़ आयी "क्यों बे हीरो घर नहीं चलना है क्या?", यह आवाज़ थी वेदिका की और साथ में थे मेरे दोस्त क्षितिज और मृदुला, मैंने कहा चलो चलते है। हम सब ने अपनी अपनी साइकिल ली और घर ओर की चलने ही वाले थे की क्षितिज ने कहा "आज हम सब आखिर बार मिल रहे कल वेदिका दिल्ली चली जायेगी, मृदुला केरल और मैं कानपूर और तू गाँव चला जाएगा चलो आज Micheal Cemetery के रास्ते से घूमते हुए Dcosta Restaurant चलते है" मैंने कहा ''तू पागल है क्या आलरेडी 3 बज चुके है और Dcosta Restaurant यहाँ से 2 किलोमीटर दूर है और तो और जिस रस्ते से तू जाने की बात कर रहा है वहाँ तो दिन में भी कोई नहीं जाता और तू इस वक़्त चलने को कह रहा है जहाँ शाम होते ही आदमी क्या जानवर भी नहीं दिखते है"
वेदिका ने मेरी बात को बीच में काटते हुए कहा
"चल न यार आखिरी बार चलते है फिर घर चले जाना इतना मत डरा कर जल्दी आ जाएंगे" ना के अंदाज़ में मैंने हामी भरी और उनके साथ चलने लगा हम थोड़ी ही दूर पहुंचे ही थे की मेरे पिताजी ड्यूटी से वापस आते नज़र आये और उन्होंने पूछ लिया की "इस वक़्त इधर कहाँ जा रहे हो भूल गए क्या कल गाँव जाना है पैकिंग भी करनी है घर चलो"
मैंने कहा
"ठीक है" मैंने साइकिल घर के रास्ते की ओर मोड़ ली। पीछे मुड़कर मैंने अपने दोस्तों को देखा उनकी नज़रें मुझे ऐसे देख रही थी की जैसे मैंने कोई गुनाह कर दिया हो, वेदिका ने कहाँ "Go Home Kido" इतना सुनते ही मुझे थोड़ा ग़ुस्सा आ गया मैंने मृदुला की ओर देखा मुझे वह थोड़ी परेशान दिख रही थी पर इस बात को नज़रअंदाज़ कर के मैं घर की ओर चल दिया और वह आखिर दिन था जब मैंने आखिरी बार अपने दोस्तों को देखा था।
गाँव आने के बाद मैंने तीनो से कॉन्टैक्ट
करने की बहुत कोशिश की पर मेरी कोशिशें सीमित ही रही क्यों की आज के हिसाब से 2008 में सोशल मीडिया और मोबाइल्स फ़ोन्स का इतना ज्यादा चलन नहीं हुआ करता था। कुछ दिनों तक ढूंढने के बाद मैंने उन तीनो को ढूंढ़ना छोड़ दिया। समय की रेत उड़ी और 16 साल बीत गए। गुज़रते वक़्त के साथ मेरी यादों में उन तीनो की तस्वीरें धुंधली हो कर मिट गयी और मैं उन्हें भूल गया। आज 2024 में, मैं एक सरकारी क्लर्क के रूप में कार्यरत हूँ, रोज़ 10 से 5 और दफ्तरी फाइलों के बीच में ज़िन्दगी गुज़र रही थी। रोज़ मर्रा की तरह आज भी फाइलों के बीच बैठ हुआ काम कर रहा था अचानक मेरी नज़र एक 2 साल पुराने पेपर के उस इस्तेहार पर पड़ी जो मृत लोगों की याद में होता है। उसमे छपी तस्वीर मुझे कुछ जानी पहचानी लगी पर दिमाग पर जोर डालने के बाद भी मुझे याद नहीं आ रहा था की यह कौन है पर मेरी आँखें तभी फटी की फटी रह गयीं जब मैंने उसका नाम पड़ा मृदुला शंकर और एक पल को मुझे यकीन नहीं हुआ की यह वही मृदुला जो मेरी उन तीन दोस्तों में एक थी पर वह अब मर चुकी है।
भाग -2 - मृदुला की खोज
मृदुला के फोटो के नीचे लैंडलाइन नंबर और उसके दिल्ली के घर का पता दिया था, मैंने सोचा एक बार फ़ोन कर के पूछ लेता हूँ की सच में यह वही मेरी क्लासमेट मृदुला है या कोई और है , मैंने कॉल किया पर नंबर नॉट इन सर्विस था। अगले दिन में उस पते पर पहुँचा पर वहाँ मुझे कोई नहीं मिला, आस पास पूछताछ की तो पता चला की वहाँ जो रहते थे वह यहां से बहुत पहले ही चले गए, सुनने में आया था की उनकी बेटी की मौत हो गयी थी। मुझे इस बात का यकीन हो गया था की मृदुला सच में मर चुकी है। इस बात ने मुझे कई दिनों तक परेशान किया, मैं सच जानने के लिए बेचैन हो रहा था। मैंने अपने एक पुराने दोस्त से बात की और मृदुला के केरल का पता माँगा कुछ दिनों के बाद मुझे उसका केरल का पता मिला। मैंने ऑफिस से एक महीने की छुट्टी ली और सच का पता लगाने के लिए निकल गया। 4 दिन के सफर के बाद मैं मृदुला के घर पहुँचा।
घर पर उसके पिताजी से मिला, मैंने उनसे पूछा "आखिर यह सब कैसे हुआ ?" उन्होंने कहा की मुझे नहीं पता की मृदुला को क्या हुआ था, मैं पिछले 7 सालों से उसका इलाज करवा रहा था पर कुछ फायदा नहीं हुआ और डॉक्टर्स ने सलाह दी की अपनी बेटी को घर ले जाइए या फिर पागलखाने में रख दीजिये मेरी एकलौती बेटी को मैं भला कैसे पागलखाने छोड़ सकता था इसलिए हम उसे घर ले आये। जिस दिन हम उसे घर लेके आये उसी रात को अचानक वह कहीं गयाब हो गयी है। इस बात को 7 साल हो चुके इन 7 सालों में मैंने अपनी बेटी को ढूंढने की कोशिश की पर कुछ भी पता नहीं लगा पाए पुलिस वालों ने मेरी बेटी को मुर्दा डिक्लेअर कर के केस को ही बंद कर दिया और 2 साल पहले हमने भी अंतिम संस्कार की सारी विधियाँ कर के उसकी मौत की खबर को पेपर में छपवा दिया मैंने सोचा की शायद अपनी मौत की खबर जानकर वह वापस आ जाए पर वह नहीं आयी।
उनको बीच में रोकते हुए मैंने पूछा की मृदुला को क्या हुआ था जो उसका इतना लम्बा ट्रीटमेंट चला? तभी घर के अंदर के किसी के रोने और चिल्लाने की आवाज़ आयी और खुले बालों में एक औरत दौड़ते हुए मेरी तरफ आने लगी तभी घर की औरतों ने उन्हें पकड़ लिया, वह जोर जोर से चिल्लाने लगी की मेरी बेटी को कैद किया है उसने, मेरी बेटी को बचा लो मेरी बेटी मेरी बेटी बोलते बोलते वह बेहोश हो गयी। मैंने अंकल से पूछा कौन है यह? उन्होंने कहा की "मृदुला की माँ है बेचारी उसके लापता होने का सदमा बर्दाश्त नहीं कर पायी और इसकी हालत भी पागलो जैसी हो गयी है और इतना कहते ही वह रोने लगे और रोते हुए अपनी करुणाभरी आवाज़ में बोले "बेटी को तो खो चूका अब पत्नी को नहीं खोना चाहता, हम बस इसी उम्मीद पर ज़िंदा है की कभी तो मेरी बेटी वापस आएगी"। मैंने पूछा यह सब शुरू कैसे हुआ? उन्होंने कहा "यह उस रात से शुरू हुआ जिस रात मृदुला और वेदिका हमें माईकल कब्रिस्तान से बेहोशी के हालत में मिली थी"।
माईकल कब्रिस्तान का नाम सुनते ही मानो जैसे मेरे आँखों सामने खौफनाक मंज़र आने लगे और उस डर और दहशत भूली याद ने फिर से मेरे दिमाग में उपज ले ली थी।
मैंने अंकल से पूछा "आप किस दिन की बात कर रहे है" उन्होंने कहा "मृदुला का १२वी का आखिर पेपर था उस दिन की बात है, उसी दिन से मृदुला को दौरे पड़ने लगे और उसका शरीर जकड़ जाता और हड्डियों का ऐसा भयानक ढाँचा बना लेता था की जिसे जिसने भी देख वह खौफज़दा हो जाता था। हर तरह से डॉक्टर को दिखाया पर कोई भी मेरी बेटी का इलाज नहीं कर पाए समय बीतता गया मेरी बेटी की हालत और खराब होती गयी। लापता होने से पहले सिर्फ यही बोलते रहती थी की वह मुझे ले जाएगा मुझे बचा लो मम्मी, पापा प्लीज मुझे बचा लो। मैंने हैरानी से पूछा क्या वेदिका की कोई खबर है आपको? उनका बस यही कहना था हमें नहीं पता बेटा पर जब हम दिल्ली में थे तो एक बार उसकी माँ को हॉस्पिटल में देखा था मेरी बेटी को देखकर वह घबरा गयी और वहाँ से जाते जाते डरते हुए सिर्फ यही बोली की अपनी बेटी को बचाओ नहीं तो वह ले जाएगा
हमने कई बार उनसे पूछा की कौन ले जाएगा पर वह ले जाएगा वह ले जाएगा रटते रटते वह वहाँ से चली गयी फिर वहाँ के एक डॉक्टर से हमें पता चला की वेदिका भी उसी हॉस्पिटल में एडमिट थी उसका भी मेरी बेटी जैसा हाल था पर उसके घरवाले उसको वहाँ से लेकर चले गए। फिर हमारी उनसे कभी मुलाक़ात नहीं हुई।
मैं निकला तो था सिर्फ मृदुला की मौत का सच जानने के लिए पर गुथी सुलझने की जगह और उलझते ही जा रही है। मृदुला मरी नहीं बल्कि लापता है, वेदिका की हालत भी मृदुला जैसी हो गयी थी पर हुआ क्या था आखिर दोनों को? वेदिका किस हाल में और कहाँ है और सबसे बड़ा सवाल यह था की उस दिन मैंने वेदिका और मृदुला के साथ साथ क्षितिज को भी आखिर बार देखा था ? क्षितिज कहाँ है जिसके बारे में अंकल ने कुछ नहीं बताया और कौन है "वह" जिसका जिक्र मृदुला ने, उसकी माँ ने और वेदिका की माँ ने किया था आखिर कौन है वह? सवालों के इस उदेड़बून में फंसा मैं निकल गया दिल्ली वेदिका की तलाश में।
भाग -3 - मेरीलैंड असाइलम
काले आसमां में गरजते बादलों के बीच चमकती बिजली, सर्दी का मौसम और यह बिन मौसम घनघोर बरसात ने मेरा बाइक चलाना बेहद मुश्किल कर दिया था। चेहरे पे पड़ती बारिश की बूँदें बर्फ से भी ठंडी थी। ठंडी हवाओं को चीरता हुआ में 90 की रफ़्तार में अपनी बाइक उस सुनसान सड़क पर बेहताशा भगाये जा रहा था। मेरी मंज़िल थी Maryland Asylum जहाँ थी वेदिका, पिछले 2 महीने की मसक्कत और खोजबीन करने के बाद मैं ढूंढ पाया उसे और मुझे जानना था वह सच जो खोलेगा माईकल कब्रिस्तान के उस राज़ को जो पिछले १६ साल से वक़्त की तिज़ोरी और वेदिका के जेहन में कैद था।
2 घंटे के बाद मैं पहुंचा Maryland Asylum.
Maryland Asylum शहर से 60 km दूर, घनघोर जंगलों के बीच 2000 एकर में फैला हुआ था यह Asylum. जिसकी ऊँची-ऊँची 10 फ़ीट की दीवारें और उसपर 6 फुट की ऊँची काँटेदार तारों की फेंसिंग यह बयान करते थे की यहाँ के किसी का भी भाग पाना नामुमकिन है। तकरीबन 112 साल पुराना यह Asylum जिसकी दीवारें अपनी इतिहास की कहानी बोल कर रही थी। बारिश में भीगती इस लाल पत्थर की इमारत से पानी ऐसे रीश के बह रहा था जैसे की खून बह रहा हो। ना जाने कितने मरीज़ों की चीखें इस Asylum की दीवारों के अंदर गूँज कर खामोश हो गयी होंगी। बाइक मैंने Asylum के विशालकाय गेट के सामने खड़ी की, वहाँ खड़े सिक्योरिटी गार्ड ने कड़क आवाज में मुझसे पूछा " किससे मिलना है तुम्हें? रात को मिलने को अलाउड नहीं है", मैंने कहा मुझे डॉक्टर निधि ने बुलाया है, इतना बोलते ही उसने गेट खोल दिया और मेरी तरफ हैरत भरी निगाह से देखने लगा, उसकी नज़रों में ढेरों सवाल थे पर मैंने इस बात को नज़र अंदाज़ कर दिया और अंदर जाने लगा। अंदर का माहौल बेहद दहशत से भरा था वहाँ आम हॉस्पिटल के तरह कमरे नहीं थे बल्कि जेल जैसे कमरे थे और जिनमें सारे मरीज़ों को रखा गया था। हर मरीज़ की अपनी ही दुनिया थी और वह उस दुनिया में खोया हुआ था, एक ऐसी दुनिया जिसका सच सिर्फ उन तक ही सीमित था।
मेन हॉल से गुज़रता हुआ मैं गलियारे में पहुँचा जहाँ डॉक्टर निधि ने एक नज़र देखा और पास खड़े वार्ड बॉय को इशारा किया, वार्ड बॉय मेरे पास आया और कहा
"चलिए सर" मैं उसके पीछे चल दिया। बरसो पुरानी लिफ्ट से मुझे वह हॉस्पिटल के बेसमेंट नंबर 3 में लेके गया बसमेंट का नज़ारा किसी हॉरर मूवी के सीन जैसा था पुरे बेसमेंट में सिर्फ 2 टूयूब लाइट थी और उसमे से भी एक ही जल रही तो कभी बुझ रही थी। वार्ड बॉय ने यह सब देखा और कहने लगा यह लाइट फिर खराब हो गयी, क्या करे साहब कितनी बार ठीक करवाई है मैंने पर हर बार खराब हो जाती है लगता है यहाँ के मरीजों को अँधेरे में ही रहना पसंद है। चलते-चलते हम दोनों बेसमेंट के आखिरी रूम पर पहुँचे, रूम नंबर 666 लोहे का दरवाज़ा और अंदर बाहर देखने के लिए सिर्फ एक छोटी सी खिड़की, वार्ड बॉय ने कहा साहब मैं अभी टोर्च ले के आता हूँ आप अंदर मत जाना इतना कह कर वह चलते चलते अँधेरे में गुम हो गया, मैंने मन ही मन कहा रूम खुला ही कहाँ है जो जाऊँगा। 10 मिनट तक इंतज़ार करने के बाद भी जब वार्ड बॉय नहीं आया तब मैंने रूम के अंदर देखने की कोशिश की अंदर बिलकुल काला घुप अँधेरा था बस किसी की धीमी धीमी आवाज़ बार-बार आ रही थी।
मैं जैसे ही पलटा वार्ड बॉय मेरे सामने खड़ा था मैं कहा तुमने तो मुझे डरा दिया उसका जवाब था "डर क्या होता है यह अभी तक आपने जाना ही नहीं है", इतने कहते ही रूम का दरवाज़ा अपने आप खुल गया मैंने दरवाज़े के हैंडल की तरफ देखा और फिर वार्ड बॉय को देखा पर वार्ड बॉय वहाँ नहीं था, जैसे मानो की वह वहाँ था ही नहीं, दरवाज़े की चरमराहट की आवाज़ पुरे बेसमेंट में गूँज रही थी और यह मौहोल और डरवाना हो गया था। रूम का दरवाज़ा खुला और धीमी आवाज़ तेज़ हो गयी पहले तो मुझे कुछ समझ नहीं आया पर ध्यान से सुनने पर मैंने सुन्ना कोई बार-बार एक ही लाइन बुदबुदा रहा था "वह मुझे ले जाएगा"। मोबाइल की फ़्लैश लाइट जला के मैंने अंदर देखने की कोशिश की पर मुझे अंदर कोई नहीं दिखा बस पूरी दीवार पर यह लिखा था की "वह मुझे ले जाएगा"।
तभी मेरे कानो में किसी ने कहा
"स्वागत है आपका जहनुम में"
मैं पीछे मुड़ा और मेरी सामने खड़ी थी एक औरत और वह बेहद गुस्से भरी नज़रों से मेरी ओर देख रही थी उसका हाल ऐसा था की जिसे देखकर किसकी की भी रूह काँप जाए। उसके पुरे शरीर पर चोट के निशान थे, जगह जगह से किसी पैनी चीज़ मानो चाक़ू से काटा गया हो, उसके आँखें अंदर की तरफ धंसी हुई, खुले बाल, सूखे फटे होंठ, उसके सीने पर बना एक अजीब निशान जिससे खून निकल रहा था उसके हाथ में टूट हुआ काँच का एक टुकड़ा था। उसने वह काँच का टुकड़ा अपने सीने में घुसा दिया और उस निशान पर बार बार घुमाने लगी जिससे खून की बौछार हो गयी। मैं अपने आप को संभाल पाता उस पहले ही उसने मुझ पर वार कर दिया और उसने उस काँच के टुकड़े को मेरी हथेलियों के आर-पार कर दिया, दर्द के मारे मेरी एक भयानक चीख निकली जिस से पूरा बेसमेंट गूँज उठा। अगले ही पल वार्ड बॉय ने मुझे झँकझोर के पूछा
"क्या हुआ साहब, क्या हुआ"?
मैंने कहा वह लड़की, उसने कहा
"साहब यहाँ कोई लड़की नहीं है, " आज शुक्रवार है मैं भी कितना भुलक्कड़ हूँ आज ट्रीटमेंट के लिए इनको ऊपर लेके जाया जाता है। कैसा ट्रीटमेंट? मैंने पूछा उसने कहा पहले आप चलिए यहाँ से और खुद ही देख लीजिये, मैं उठा और उसके साथ चलने लगा, बेसमेंट के अंत में लिफ्ट थी लिफ्ट पर चढ़ते ही मुझे अँधेरे में गुम होती वही लड़की नज़र आयी।
मैं खड़ा था ECT ROOM (ELECTROCONVULSIVE THERAPY ROOM) आसान शब्दों में कहूँ तो वो कमरा जिसमे पागलपन के शिकार मरीज़ों को इलेक्ट्रिक शॉक यानी बिजली के झटके दिए जाते है। मुझे बाहर बैठाकर वार्ड बॉय अंदर चला गया। मैंने शीशे की छोटी सी खिड़की से अंदर देखा तो बैड पर एक लड़की लेटी उसका चेहरा झुल्फों से घिरा हुआ था, उसके हाथों और पैरों को बैड के साथ बाँधा गया था। अंदर खड़े डॉक्टर आपस में कुछ बात और इशारे कर रहे थे और थोड़ी देर के बाद उन लोगों ने अपना काम चालू कर दिया, बिजली के एक झटके ने उस लड़की के चेहरे से बालों को झटक दिया और मुझे आया उस लड़की का चेहरा जिसकी मुझे तलाश थी वह थी वेदिका पर वह उस हाल में नहीं थी जिस हाल में मैंने उसे १६ साल पहले छोड़ा था, उसके पुरे शरीर पर जख्म के निशान थे उसकी आँखें मुझे पुकार रही थी, बिजली के झटके उसका सारा बदन तड़प उठा यह सब मुझसे देखा नहीं गया और मैं दूर जा कर खड़ा हो गया । डॉक्टर्स ने अपना काम ख़त्म किया और सब बाहर निकल आये। मौका देख कर मैं कमरे के अंदर घुस गया बेहोशी की हालत में भी वेदिका ने एक नज़र में मुझे पहचान लिया और उसके आंखें से गिरते आँसुओं ने इस बात की पुष्टि कर दी की देर से ही सही पर कोई तो है को मेरे लिए आया है।
इतने में ही वार्ड बॉय ने अंदर आ गया और कहा साहब आपको अंदर नहीं आना चाहिए डॉक्टर्स देख लेंगे तो गुस्सा करेंगे। इनको आज हम दूसरे कमरे में शिफ्ट करेंगे वहां आप मिल लेना। वेदिका को दूसरे कमरे में शिफ्ट किया गया। रात और अँधेरी और लम्बी होते जा रही थी मानो जैसे इस रात की सुबह ही नहीं। थोड़ी देर बाद वार्ड बॉय मेरे पास आया और कहा "अब आप मिल सकते हो, पर साहब आप उनसे भला क्या बात करोगे वह तो कुछ बोलती ही नहीं है रिकॉर्ड के मुताबिक़ 14 साल से वह यहाँ है पता नहीं उसे हुआ क्या है बस कहते रहती है वह मुझे ले जाएगा, साहब मुझे तो दस साल हो गये है यहाँ काम करते करते पर "वह" कौन जो इनको ले के जाएगा ? उसका तो कोई भी पता नहीं लगा पाया और हैरानी की बात यह है की इन दस सालों में सिर्फ आप ही अकेले शक़्स है जो उनसे मिलने आये आपकी कोई खास लगती है इनके जो भी रिस्तेदार आते थे वह शुरुवाती दिनों में आये और फिर एक साल तक कोई नहीं और अब तो साहब 10 साल के बाद आप आये है, यह रूम है साहब आप मिल लो पर मरीज़ के ज्यादा करीब मत जाना और एक बात और साहब कहीं आप ही तो वो नहीं हो जो इनको ले कर जाएगा? इतना कह कर वार्ड बॉय वहाँ से चला गया।
वेदिका को इस हाल में देखने की मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी पर मेरे पास और कोई ऑप्शन नहीं था क्यूंकि मुझे वह उस दिन का सच जानना था। मैं उसके रूम के घुसा और घुसते ही मुझे ऐसा लग रहा था की कोई वहाँ पहले से ही मौजूद है, वेदिका अधमरी हालात में थी मुझे कुछ कहने की जरुरत नहीं पड़ी की मैं कौन हूँ। उसने मुझे देखा और सिर्फ मुझसे इतना ही कहा बचा लो मुझे। इतना कहकर वह बेहोश हो गयी मैं उसके पास खड़ा हो गया और उसकी ऊपर से नीचे तक निहारने लगा मुझसे उसकी यह हालत देखी न गयी और मैं जैसे ही बाहर जाने लगा उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और धीमे से कहा "प्लीज मुझे बचा लो वह मुझे ले जाएगा"। इतने में वार्ड बॉय फिर वहाँ आ गया और उसे बेसमेंट में ले जाने लगा मैंने रोकने की कोशिश की तो कहा
"साहब इनको यहाँ नहीं रख सकते यह बहुत खतरनाक मरीज़ है कभी भी हमला कर देती है"। वह उसे बेसमेंट में ले जाने लगा और मैं यह सब चुप चाप देख रहा था। उसके रूम के बाहर में बैठा खुद को उसकी इस हालत का दोषी मान रहा था और खुद को बार-बार कोस रहा था की काश उस दिन मैं उन तीन दोस्तों को रोक देता काश यह वहाँ नहीं जाते तो आज यह सब इस हाल में नहीं होते।
मैं यह सब सोच ही रहा था की मेरे सामने से डॉ निधि गुज़री तो मैंने उनसे पूछ लिया की मैं मरीज़ से कब मिल सकता हूँ मुझे उससे बात करनी है। डॉ निधि ने कहा "आप सुबह मिल सकते है" पर आप उस पेसेंट से क्या बात करोगे वह हर बात का एक ही जवाब देती है की "वह मुझे ले जाएगा"
हमने कई बार उससे पूछा की वह कौन है जो तुम्हे ले जाएगा पर वह सिर्फ एक बात-बार दोहराती है की वह मुझे ले जाएगा। मैंने पूछा उसको हुआ क्या है ? डॉ निधि ने कहा She
is Suffering From Schizophrenia. मैंने चौंक के पूछा "Schizophrenia ? मतलब?", मतलब Hallucinations यह भ्र्म होना की अँधेरे में कोई खड़ा है और उसे ही सिर्फ घूर रहा है, कोई उसका नाम बार पुकार रहा है, She Can See Dead People यह ऐसी चीज़ें देखने का दावा करती है जो वहाँ मौजूद ही नहीं है Ghost
And Demons All That Type Of Stuff. मैंने ऐसे कई केसेस देखे जिसमे मरीज़ ठीक भी हो जाते है पर वेदिका के केस में It's
Taking Too Long Well We Are Trying Our Level Best To Cure Her, पर एक बात बताइये आप क्या लगते है वेदिका के मैंने कहा मैं उसका दोस्त हूँ स्कूल में हम एक साथ ही पढ़ते थे। डॉ निधि ने कहा दस साल हो गए है उसको यहाँ पर इन दस सालों में कोई भी नहीं आया अभी तक सिर्फ आप आये हो,
शायद आपके आने से उसकी कुछ इम्प्रूवमेंट हो सके, वेल अब मुझे जाना होगा मेरे ड्यूटी खत्म हो गयी है हम सुबह मिलते है और इतना कह कर डॉ निधि वहाँ से चली गयी।
मैं भी होटल वापस जाने के लिए हॉस्पिटल के मैन गेट पर पहुँचा तो देखा की बेहद तेज़ बारिश हो रही थी और धुंध की वजह से कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। पीछे से आते वार्ड बॉय ने कहा साहब आप इतनी बारिश में नहीं जा पाओगे आप आज यहीं रुक जाओ मैंने पूछा यहाँ आसपास कोई होटल है क्या? वह हँसा अरे साहब इस वीरान जंगल में भला कौन होटल या घर बनाएगा मैंने पूछा ऐसे
Situation में हॉस्पिटल स्टाफ घर कैसे जाते है
?", रात में कोई स्टाफ यहाँ नहीं रुकता सारे स्टाफ 4 बजे दिन में घर चले जाते क्यों की यह जंगली इलाका है, शहर से काफी दूर है और अँधेरा जल्दी हो जाता है सिर्फ एक गार्ड रहता है आज फ्राइडे है ECT
THERAPY देनी होती है बेसमेंट -3 के मरीज़ों को इसलिए डॉ निधि और उनके साथ के डॉक्टर्स आज इतने देर तक रुके थे और शायद आपसे भी मिलना था डॉ निधि ने बताया था की कोई रूम 666 के पेशेंट से मिलने के लिए आ रहा है। इतना कह कर वह हॉस्पिटल के बाहर बने एक रूम में चला गया और मैं पास के बेंच पर बैठकर बारिश के थमने होने का इंतज़ार कर रहा था, मुझे वेदिका से मिलने की बेचैनी थी और इस बेचैनी की सोच में मेरी आँख कब लग गयी मुझे पता ही नहीं चला और मैं वही बेंच पर सो गया।
बरसों बाद लौटी वो यादें… 550 साल पुराना Michael Cemetery, जहाँ हर कब्र पर छुपा है खौफ का एक नया किस्सा।
वहीँ से शुरू हुई एक ऐसी घटना, जिसने न सिर्फ मेरी ज़िन्दगी बदल दी बल्कि मेरे दोस्तों की किस्मत भी हमेशा के लिए बदल दी।
क्या हुआ उस दिन, जब मैंने अपने दोस्तों को आखिरी बार देखा?
क्या रहस्य छुपा है उस कब्रिस्तान की वीरान दीवारों और डरावनी परछाइयों के पीछे?
👉 पूरी कहानी पढ़िए और खुद को इस खौफनाक सफर में डुबो दीजिए।
🕸️ आपको यह कहानी कैसी लगी?
अपने विचार और अनुभव हमें कमेंट्स में ज़रूर बताइए और जुड़े रहिए क्योंकि माईकल कब्रिस्तान सीरीज -2 बहुत जल्द आ रहा है…




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